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Rigveda Mandal 3 / Sukta 6 / Mantra 6

62 Sukta
11 Mantra
3/6/6
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ऋ॒तस्य॑ वा के॒शिना॑ यो॒ग्याभि॑र्घृत॒स्नुवा॒ रोहि॑ता धु॒रि धि॑ष्व। अथा व॑ह दे॒वान्दे॑व॒ विश्वा॑न्त्स्वध्व॒रा कृ॑णुहि जातवेदः॥

ऋ॒तस्य॑ । वा॒ । के॒शिना॑ । यो॒ग्याभिः॑ । घृ॒त॒ऽस्नुवा॑ । रोहि॑ता । धु॒रि । धि॒ष्व॒ । अथ॑ । व॒ह । दे॒वान् । दे॒व॒ । विश्वा॑न् । सु॒ऽअ॒ध्व॒रा । कृ॒णु॒हि॒ । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ ॥

Mantra without Swara
ऋतस्य वा केशिना योग्याभिर्घृतस्नुवा रोहिता धुरि धिष्व। अथा वह देवान्देव विश्वान्त्स्वध्वरा कृणुहि जातवेदः॥

ऋतस्य। वा। केशिना। योग्याभिः। घृतऽस्नुवा। रोहिता। धुरि। धिष्व। अथ। वह। देवान्। देव। विश्वान्। सुऽअध्वरा। कृणुहि। जातऽवेदः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 27 Mantra » 1

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Meaning
हे (जातवेदः) जो उत्पन्न हुए पदार्थों को जानता है वह हे (देव) दान देनेवाले विद्वान् ! आप (धुरि) धुरे पर (ऋतस्य) जल के (योग्याभिः) योग्य पृथिवियों से (केशिना) जिनमें बहुत सी किरणें विद्यमान वा (घृतस्नुवा) जो जल को चुआते (रोहिता) उन रत्न गुणवाले अश्वों को धुरे में (धिष्व) धरो लगाओ (वा) वा (स्वध्वरा) जिनसे सुन्दर यज्ञ होता उनको (कृणुहि) अच्छे प्रकार सिद्ध करो (अथ) इसके अनन्तर (विश्वान्) समस्त (देवान्) दिव्य गुणों को (आ, वह) प्राप्त करो ॥६॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे ईश्वर ने सूर्य और बिजुली सबके चलानेवाले ब्रह्माण्ड में धरे स्थापन किये, वैसे तुम लोग अश्वादिकों को धारण करो और इस काम से समस्त गुणों को स्वीकार करो ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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