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Rigveda Mandal 3 / Sukta 6 / Mantra 4

62 Sukta
11 Mantra
3/6/4
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म॒हान्त्स॒धस्थे॑ ध्रु॒व आ निष॑त्तो॒ऽन्तर्द्यावा॒ माहि॑ने॒ हर्य॑माणः। आस्क्रे॑ स॒पत्नी॑ अ॒जरे॒ अमृ॑क्ते सब॒र्दुघे॑ उरुगा॒यस्य॑ धे॒नू॥

म॒हान् । स॒धऽस्थे॑ । ध्रु॒वः । आ । निऽस॑त्तः । अ॒न्तः । द्यावा॑ । माहि॑ने॒ इति॑ । हर्य॑माणः । आस्क्रे॒ इति॑ । स॒पत्नी॒ इति॑ स॒ऽपत्नी॑ । अ॒जरे॒ इति॑ । अमृ॑क्ते॒ इति॑ । स॒ब॒र्दुघे॒ इति॑ स॒बः॒ऽदुघे॑ । उ॒रु॒ऽगा॒यस्य॑ । धे॒नू इति॑ ॥

Mantra without Swara
महान्त्सधस्थे ध्रुव आ निषत्तोऽन्तर्द्यावा माहिने हर्यमाणः। आस्क्रे सपत्नी अजरे अमृक्ते सबर्दुघे उरुगायस्य धेनू॥

महान्। सधऽस्थे। ध्रुवः। आ। निऽसत्तः। अन्तः। द्यावा। माहिने इति। हर्यमाणः। आस्क्रे इति। सपत्नी इति सऽपत्नी। अजरे इति। अमृक्ते इति। सबर्दुघे इति सबःऽदुघे। उरुऽगायस्य। धेनू इति॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 26 Mantra » 4

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Meaning
जो (महान्) बड़े परिमाणवाला (सधस्थे) समानस्थान में (ध्रुवः) निश्चल (माहिने) महत्त्व के लिये (हर्यमाणः) कामना करता हुआ (द्यावा) आकाश और पृथिवी के (अन्तः) बीच में (आ, निषत्तः) निरन्तर स्थिर अग्नि (आस्क्रे) जिनका आक्रमण करना अर्थात् अनुक्रम से चलना स्वभाव (अजरे) जो जीर्ण अवस्था रहित (अमृक्ते) विकार अवस्था से अशुद्ध (सबर्दुघे) एक से स्वीकार को अच्छे प्रकार पूरे करनेवाली (उरुगायस्य) बहुतों से जो स्तुति को प्राप्त हुआ उसकी (सपत्नी) सपत्नी के समान वर्त्तमान वा (धेनू) दो गौओं के समान पालन करनेवाली हैं उनको व्याप्त होता है वह सबको जानने योग्य है ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो यह सूर्यलोक दीख पड़ता है, वह सबसे बड़ा और अपनी परिधि में निरन्तर वसता हुआ सब भूगोलों को प्रकाशित करता है, जिससे कि दिन-रात्रि होते हैं, उस को जानो ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

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