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Rigveda Mandal 3 / Sukta 6 / Mantra 2

62 Sukta
11 Mantra
3/6/2
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ रोद॑सी अपृणा॒ जाय॑मान उ॒त प्र रि॑क्था॒ अध॒ नु प्र॑यज्यो। दि॒वश्चि॑दग्ने महि॒ना पृ॑थि॒व्या व॒च्यन्तां॑ ते॒ वह्न॑यः स॒प्तजि॑ह्वाः॥

आ । रोद॑सी॒ इति॑ । अ॒पृ॒णाः॒ । जाय॑मानः । उ॒त । प्र । रि॒क्थाः॒ । अध॑ । नु । प्र॒य॒ज्यो॒ इति॑ प्रऽयज्यो । दे॒वः । चि॒त् । अ॒ग्ने॒ । म॒हि॒ना । पृ॒थि॒व्याः । व॒च्यन्ता॑म् । ते॒ । वह्न॑यः । स॒प्तऽजि॑ह्वाः ॥

Mantra without Swara
आ रोदसी अपृणा जायमान उत प्र रिक्था अध नु प्रयज्यो। दिवश्चिदग्ने महिना पृथिव्या वच्यन्तां ते वह्नयः सप्तजिह्वाः॥

आ। रोदसी इति। अपृणाः। जायमानः। उत। प्र। रिक्थाः। अध। नु। प्रयज्यो इति प्रऽयज्यो। देवः। चित्। अग्ने। महिना। पृथिव्याः। वच्यन्ताम्। ते। वह्नयः। सप्तऽजिह्वाः॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 26 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (प्रयज्यो) उत्तम यज्ञ करनेवाले (अग्ने) अग्नि के समान विद्वान् ! (दिवः) प्रकाश और (पृथिव्याः) भूमि के (महिना) महत्त्व से (सप्तजिह्वाः) काली आदि सात जिह्वा ज्वालावाले (वह्नयः) पदार्थ को देशान्तर में पहुँचानेवाले अग्नि तुम्हें (वच्यन्ताम्) कहने चाहिये और सो आप (जायमानः) उत्पन्न होते हुए (रोदसी) आकाश और पृथिवी को (अपृणाः) परिपूर्ण कीजिये (उत) और (आ, प्र, रिक्थाः) दोषों को सब ओर से अच्छे प्रकार दूर कीजिये (अध) इसके अनन्तर (ते) आपको (चित्) (तु) शीघ्र निश्चय करके सुख हो ॥२॥
Essence
जैसे सूर्य, पृथिवी और अग्नि की महिमा वर्त्तमान है, वैसे जो अग्निविद्या और भूगर्भविद्या को जानता है, वह निरन्तर सुखी हो ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।