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Rigveda Mandal 3 / Sukta 6 / Mantra 10

62 Sukta
11 Mantra
3/6/10
Devata- अग्निः Rishi- गाथिनो विश्वामित्रः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स होता॒ यस्य॒ रोद॑सी चिदु॒र्वी य॒ज्ञंय॑ज्ञम॒भि वृ॒धे गृ॑णी॒तः। प्राची॑ अध्व॒रेव॑ तस्थतुः सु॒मेके॑ ऋ॒ताव॑री ऋ॒तजा॑तस्य स॒त्ये॥

सः । होता॑ । यस्य॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । चि॒त् । उ॒र्वी इति॑ । य॒ज्ञम्ऽय॑ज्ञम् । अ॒भि । वृ॒धे । गृ॒णी॒तः । प्राची॒ इति॑ । अ॒ध्व॒राऽइ॑व । त॒स्थ॒तुः । सु॒मेके॒ इति॑ सु॒ऽमेके॑ । ऋ॒तव॑री॒ इत्यृ॒तऽव॑री । ऋ॒तऽजा॑तस्य । स॒त्ये इति॑ ॥

Mantra without Swara
स होता यस्य रोदसी चिदुर्वी यज्ञंयज्ञमभि वृधे गृणीतः। प्राची अध्वरेव तस्थतुः सुमेके ऋतावरी ऋतजातस्य सत्ये॥

सः। होता। यस्य। रोदसी इति। चित्। उर्वी इति। यज्ञम्ऽयज्ञम्। अभि। वृधे। गृणीतः। प्राची इति। अध्वराऽइव। तस्थतुः। सुमेके इति सुऽमेके। ऋतावरी इत्यृतऽवरी। ऋतऽजातस्य। सत्ये इति॥

Ashtak » 2 Adhyay » 8 Varga » 27 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
(यस्य) जिस अग्नि के संबन्ध में (उर्वी) बहु स्वरूपवाले (अध्वरेव) न नष्ट करने योग्य यज्ञों के समान (प्राची) प्राक्तन (सुमेके) अच्छे प्रकार प्रक्षेप किये हुए (ऋतावरी) जिनमें बहुत उदक जल विद्यमान (ऋतजातस्य) सत्य कारण से उत्पन्न हुए संसार के बीच (सत्ये) विद्यमान पदार्थों में हित या कारणरूप से नित्य (रोदसी) जो आकाश और पृथिवी (वृधे) वृद्धि के लिये (यज्ञंयज्ञम्) प्रति व्यवहार को (आभिगृणीतः) सन्मुख कहते (चित्) ही (तस्थतुः) स्थित होते हैं (सः) वह (होता) ग्रहणकर्त्ता वा सर्व पदार्थों को धारणकर्त्ता अग्नि सबको जानने योग्य है ॥१०॥
Essence
यदि भूमि सूर्य्य उदय को न प्राप्त हों, तो किसी व्यवहार के सिद्ध करने को कोई योग्य न हो और न किसी की वृद्धि हो ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।