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Rigveda Mandal 3 / Sukta 59 / Mantra 8

62 Sukta
9 Mantra
3/59/8
Devata- मित्रः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मि॒त्राय॒ पञ्च॑ येमिरे॒ जना॑ अ॒भिष्टि॑शवसे। स दे॒वान्विश्वा॑न्बिभर्ति॥

मि॒त्राय । पञ्च॑ । ये॒मि॒रे॒ । जनाः॑ । अ॒भिष्टि॑ऽशवसे । सः । दे॒वान् । विश्वा॑न् । बि॒भ॒र्ति॒ ॥

Mantra without Swara
मित्राय पञ्च येमिरे जना अभिष्टिशवसे। स देवान्विश्वान्बिभर्ति॥

मित्राय। पञ्च। येमिरे। जनाः। अभिष्टिऽशवसे। सः। देवान्। विश्वान्। बिभर्ति॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 6 Mantra » 3

Bhashya

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Meaning
हे मनुष्यो ! ये (पञ्च) पाँच प्राण आदि के सदृश (जनाः) विद्वान् लोग जिस (अभिष्टिशवसे) अपेक्षित बलयुक्त (मित्राय) मित्र के सदृश सबको सुख देनेवाले परमात्मा के लिये (येमिरे) यमादि साधन साधते हैं, (सः) वह (विश्वान्) समस्त (देवान्) सूर्य्य आदिकों को (बिभर्त्ति) धारण तथा पोषण करता है, ऐसा जानो ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे रोके गये प्राणवायु इन्द्रियों को रोकते हैं, वैसे ही योगीजन समाधि से परमात्मा को प्राप्त होते हैं ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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