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Rigveda Mandal 3 / Sukta 59 / Mantra 6

62 Sukta
9 Mantra
3/59/6
Devata- मित्रः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मि॒त्रस्य॑ चर्षणी॒धृतोऽवो॑ दे॒वस्य॑ सान॒सि। द्यु॒म्नं चि॒त्रश्र॑वस्तमम्॥

मि॒त्रस्य॑ । च॒र्ष॒णि॒ऽधृतः॑ । अवः॑ । दे॒वस्य॑ । सा॒न॒सि । द्यु॒म्नम् । चि॒त्रश्र॑वःऽतमम् ॥

Mantra without Swara
मित्रस्य चर्षणीधृतोऽवो देवस्य सानसि। द्युम्नं चित्रश्रवस्तमम्॥

मित्रस्य। चर्षणिऽधृतः। अवः। देवस्य। सानसि। द्युम्नम्। चित्रश्रवःऽतमम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 6 Mantra » 1

Bhashya

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Meaning
हे मनुष्यो ! जिस (चर्षणीधृतः) मनुष्यों के धारण करनेवाले (मित्रस्य) सबके मित्र (देवस्य) विद्वान् राजा का (सानसि) प्राचीन (अवः) रक्षा आदि (चित्रश्रवस्तमम्) जिसके अत्यन्त होने से अद्भुत श्रवण वा अन्न सिद्ध होते (द्युम्नम्) और जो वश करनेवाला धन वा विज्ञान है, वही प्रजाओं की रक्षा कर सकता है ॥६॥
Essence
जो लोग अनादिकाल से सिद्ध विद्याधन का ग्रहण करके सम्पूर्ण प्रजाओं की रक्षा करते हैं, वे इसलोक और परलोक में सुख को प्राप्त होते हैं ॥६॥
Subject
अब प्रजा, मित्र, राजा के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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