Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 3 / Sukta 59 / Mantra 5

62 Sukta
9 Mantra
3/59/5
Devata- मित्रः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म॒हाँ आ॑दि॒त्यो नम॑सोप॒सद्यो॑ यात॒यज्ज॑नो गृण॒ते सु॒शेवः॑। तस्मा॑ ए॒तत्पन्य॑तमाय॒ जुष्ट॑म॒ग्नौ मि॒त्राय॑ ह॒विरा जु॑होत॥

म॒हान् । आ॒दि॒त्यः । नम॑सा । उ॒प॒ऽसद्यः॑ । या॒त॒यत्ऽज॑नः । गृ॒ण॒ते । सु॒ऽशेवः॑ । तस्मै॑ । ए॒तत् । पन्य॑ऽतमाय । जुष्ट॑म् । अ॒ग्नौ । मि॒त्राय॑ । ह॒विः । आ । जु॒हो॒त॒ ॥

Mantra without Swara
महाँ आदित्यो नमसोपसद्यो यातयज्जनो गृणते सुशेवः। तस्मा एतत्पन्यतमाय जुष्टमग्नौ मित्राय हविरा जुहोत॥

महान्। आदित्यः। नमसा। उपऽसद्यः। यातयत्ऽजनः। गृणते। सुऽशेवः। तस्मै। एतत्। पन्यऽतमाय। जुष्टम्। अग्नौ। मित्राय। हविः। आ। जुहोत॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 5 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (आदित्यः) सूर्य्य के सदृश अच्छे गुणों का प्रकाश करनेवाला (महान्) बड़े-बड़े गुणों से युक्त (सुशेवः) जिसका उत्तम सुख (यातयज्जनः) जो प्रेरणा करता हुआ जन (नमसा) सत्कार से (उपसद्यः) प्राप्त होने योग्य हो और जिसकी सब लोग (गृणते) स्तुति करते हैं (तस्मै) उस (पन्यतमाय) अत्यन्त प्रशंसायुक्त (मित्राय) प्राणों के सदृश वर्त्तमान पुरुष के लिये (अग्नौ) अग्नि में (हविः) हवन करने तथा खाने योग्य पदार्थ के सदृश (एतत्) इस (जुष्टम्) प्रिय पदार्थ को (आ, जुहोत) देओ ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही पूज्य सूर्य्य के सदृश विद्या और धर्म के प्रकाश करनेवाले यथार्थवक्ता विद्वान् लोग हैं कि जो उत्तम गुण और कर्मों में सबको प्रेरणा करैं। जैसे ऋत्विक् अर्थात् ऋतु-ऋतु में हवन करनेवाले लोग अग्नि में अच्छे बनाए हुए हवि अर्थात् होम करने योग्य पदार्थ को होम के संसार को प्रसन्न करते हैं, वैसे ही उत्तमगुणों से युक्त विद्यार्थी जनों में विद्या और धर्म को अच्छे प्रकार स्थापन करके सब मनुष्य आदि प्राणियों को सुखी करते हैं ॥५॥
Subject
अब मित्र के लिये प्रिय पदार्थ देने को अगले मन्त्र में कहते हैं।