Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 3 / Sukta 59 / Mantra 2

62 Sukta
9 Mantra
3/59/2
Devata- मित्रः Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र स मि॑त्र॒ मर्तो॑ अस्तु॒ प्रय॑स्वा॒न्यस्त॑ आदित्य॒ शिक्ष॑ति व्र॒तेन॑। न ह॑न्यते॒ न जी॑यते॒ त्वोतो॒ नैन॒मंहो॑ अश्नो॒त्यन्ति॑तो॒ न दू॒रात्॥

प्र । सः । मि॒त्र॒ । मर्तः॑ । अ॒स्तु॒ । प्रय॑स्वान् । यः । ते॒ । आ॒दि॒त्य॒ । शिक्ष॑ति । व्र॒तेन॑ । न । ह॒न्य॒ते॒ । न । जी॒य॒ते॒ । त्वाऽऊ॑तः । न । ए॒न॒म् । अंहः॑ । अ॒श्नो॒ति॒ । अन्ति॑तः । न । दू॒रात् ॥

Mantra without Swara
प्र स मित्र मर्तो अस्तु प्रयस्वान्यस्त आदित्य शिक्षति व्रतेन। न हन्यते न जीयते त्वोतो नैनमंहो अश्नोत्यन्तितो न दूरात्॥

प्र। सः। मित्र। मर्तः। अस्तु। प्रयस्वान्। यः। ते। आदित्य। शिक्षति। व्रतेन। न। हन्यते। न। जीयते। त्वाऽऊतः। न। एनम्। अंहः। अश्नोति। अन्तितः। न। दूरात्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 5 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (मित्र) मित्र यथार्थवक्ता विद्वान् वा जगदीश्वर ! (यः) जो (मर्त्तः) मनुष्य (प्रयस्वान्) प्रयत्नवाला (अस्तु) हो। और हे (आदित्य) अविनाशिस्वरूप ! जो मनुष्य (ते) आपके (व्रतेन) कर्म से जैसे वैसे अन्य जनों को (प्र, शिक्षति) विद्याग्रहण कराता वा आप ग्रहण करता है (सः) वह (त्वोतः) आपसे रक्षित अन्य जनों से (न)(हन्यते) मारा जाता (न) और न (जीयते) जीता जाता है (एनम्) इसको (अन्तितः) समीप से (अंहः) पाप (न) नहीं (अश्नोति) प्राप्त होता और (न) न इसको (दूरात्) दूर से पाप प्राप्त होता है ॥२॥
Essence
जो मनुष्य यथार्थवक्ता और स्वामी के गुणकर्म और स्वभाव के सदृश अपने गुणकर्म और स्वभावों को करके सत्य न्याय से सबको शिक्षा करते हैं, वे पापरहित धर्मात्मा होकर यथार्थवक्ता और स्वामी से रक्षित हुए दुष्टों से नाश तथा पराजय को प्राप्त नहीं हो सकते और न वे दूर वा समीप से पक्षपात से पाप का सेवन करते हैं ॥२॥
Subject
अब ईश्वर और आप्त विद्वान् के मित्रपन को अगले मन्त्र में कहते हैं।