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Rigveda Mandal 3 / Sukta 58 / Mantra 9

62 Sukta
9 Mantra
3/58/9
Devata- अश्विनौ Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अश्वि॑ना मधु॒षुत्त॑मो यु॒वाकुः॒ सोम॒स्तं पा॑त॒मा ग॑तं दुरो॒णे। रथो॑ ह वां॒ भूरि॒ वर्पः॒ करि॑क्रत्सु॒ताव॑तो निष्कृ॒तमाग॑मिष्ठः॥

अश्वि॑ना । म॒धु॒सुत्ऽत॑मः । यु॒वाकुः॑ । सोमः॑ । तम् । पा॒त॒म् । आ । ग॒त॒म् । दु॒रो॒णे । रथः॑ । ह॒ । वा॒म् । भूरि॑ । वर्पः॑ । करि॑क्रत् । सु॒तऽव॑तः । निः॒ऽकृ॒तम् । आऽग॑मिष्ठः ॥

Mantra without Swara
अश्विना मधुषुत्तमो युवाकुः सोमस्तं पातमा गतं दुरोणे। रथो ह वां भूरि वर्पः करिक्रत्सुतावतो निष्कृतमागमिष्ठः॥

अश्विना। मधुसुत्ऽतमः। युवाकुः। सोमः। तम्। पातम्। आ। गतम्। दुरोणे। रथः। ह। वाम्। भूरि। वर्पः। करिक्रत्। सुतऽवतः। निःऽकृतम्। आऽगमिष्ठः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 4 Mantra » 4

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Meaning
हे (अश्विना) सबके अधीश और सेनाके अधीश ! जो (ह) निश्चय (वाम्) आप दोनों का (रथः) (भूरि) बड़े (वर्पः) रूप से युक्त (सुतावतः) उत्पन्न ऐश्वर्य कोश के (निष्कृतम्) सिद्ध हुए विषय को (आगमिष्ठः) अतिशय करके प्राप्त होनेवाला (करिक्रत्) निरन्तरकारी है उससे जो (मधुषुत्तमः) मीठे रसों को निचोड़नेवाला (युवाकुः) मिला और अनमिला (सोमः) ऐश्वर्य का लाभ है (तम्) इसकी (दुरोणे) गृह में (पातम्) रक्षा कीजिये और अन्य देश से अपने देश में (आ, गतम्) आइए ॥९॥
Essence
जो मनुष्य शिल्पविद्या से अनेक कलायन्त्रों का निर्माण करके वाहन आदि को रचते हैं, वे अपने गृह कुल और देश में पूर्ण ऐश्वर्य कर सकते हैं ॥९॥ इस सूक्त में अश्वि शब्द से शिल्पीजनों का कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह अट्ठावनवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब शिल्पविद्याफल को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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