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Rigveda Mandal 3 / Sukta 58 / Mantra 8

62 Sukta
9 Mantra
3/58/8
Devata- अश्विनौ Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अश्वि॑ना॒ परि॑ वा॒मिषः॑ पुरू॒चीरी॒युर्गी॒र्भिर्यत॑माना॒ अमृ॑ध्राः। रथो॑ ह वामृत॒जा अद्रि॑जूतः॒ परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी या॑ति स॒द्यः॥

अश्वि॑ना । परि॑ । वा॒म् । इषः॑ । पु॒रू॒चीः । ई॒युः । गीः॒ऽभिः । यत॑मानाः । अमृ॑ध्राः । रथः॑ । ह॒ । वा॒म् । ऋ॒त॒ऽजाः । अद्रि॑ऽजूतः । परि॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । या॒ति॒ । स॒द्यः ॥

Mantra without Swara
अश्विना परि वामिषः पुरूचीरीयुर्गीर्भिर्यतमाना अमृध्राः। रथो ह वामृतजा अद्रिजूतः परि द्यावापृथिवी याति सद्यः॥

अश्विना। परि। वाम्। इषः। पुरूचीः। ईयुः। गीःऽभिः। यतमानाः। अमृध्राः। रथः। ह। वाम्। ऋतऽजाः। अद्रिऽजूतः। परि। द्यावापृथिवी इति। याति। सद्यः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 4 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) सम्पूर्ण विद्याओं में व्याप्त रमते हुए यदि (वाम्) आप दोनों को (ऋतजाः) सत्य से उत्पन्न (अद्रिजूतः) मेघ में शीघ्र जानेवाला (रथः) वाहन (द्यावापृथिवी) भूमि और प्रकाश को (सद्यः) शीघ्र (परि, याति) सब ओर पहुँचाता है तो उससे (वाम्) आप दोनों को (ह) निश्चयकर (गीर्भिः) वाणियों से जैसे (अमृध्राः) अध्यापक और उपदेशक (यतमानाः) प्रयत्न करते प्राप्त हों वैसे (पुरूचीः) सुखों को पहुँचानेवाली (इषः) इच्छा सिद्धियों को (परि, ईयुः) सब ओर प्राप्त होवैं ॥८॥
Essence
जो लोग विमान आदि यानों को अग्नि आदि से रचते हैं, वे अभीष्ट सुखों को प्राप्त होकर जहाँ इच्छा हो, शीघ्र जा सकते हैं ॥८॥
Subject
अब शिल्पविद्यासिद्ध यान से जाने-आने के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।