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Rigveda Mandal 3 / Sukta 58 / Mantra 6

62 Sukta
9 Mantra
3/58/6
Devata- अश्विनौ Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
पु॒रा॒णमोकः॑ स॒ख्यं शि॒वं वां॑ यु॒वोर्न॑रा॒ द्रवि॑णं ज॒ह्नाव्या॑म्। पुनः॑ कृण्वा॒नाः स॒ख्या शि॒वानि॒ मध्वा॑ मदेम स॒ह नू स॑मा॒नाः॥

पु॒रा॒णम् । ओकः॑ । स॒ख्यम् । शि॒वम् । वा॒म् । यु॒वोः । न॒रा॒ । द्रवि॑णम् । ज॒ह्नाव्या॑म् । पुन॒रिति॑ । कृ॒ण्वा॒नाः । स॒ख्या । शि॒वानि॑ । मध्वा॑ । म॒दे॒म॒ । स॒ह । नु । स॒मा॒नाः ॥

Mantra without Swara
पुराणमोकः सख्यं शिवं वां युवोर्नरा द्रविणं जह्नाव्याम्। पुनः कृण्वानाः सख्या शिवानि मध्वा मदेम सह नू समानाः॥

पुराणम्। ओकः। सख्यम्। शिवम्। वाम्। युवोः। नरा। द्रविणम्। जह्नाव्याम्। पुनरिति। कृण्वानाः। सख्या। शिवानि। मध्वा। मदेम। सह। नु। समानाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 4 Mantra » 1

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Meaning
हे (नरा) नायक सभा और सेना के ईशो ! (वाम्) आप दोनों (पुराणम्) प्राचीनकाल से सिद्ध (ओकः) सब ऋतुओं में सुख देनेवाले स्थान के तुल्य (शिवम्) कल्याण करनेवाले (सख्यम्) मित्र के कर्म को प्राप्त हूजिये और (जह्नाव्याम्) त्याग करनेवाले की नीति में (युवोः) तुम दोनों को (द्रविणम्) धन प्राप्त हो (पुनः) फिर (शिवानि) सुख करनेवाले (सख्या) मित्र के कर्मों को (कृण्वानाः) करते हुए (समानाः) तुल्य और उत्तम गुण कर्म स्वभाववाले हम लोग (मध्वा) मधुरभाव के (सह) साथ (नु) शीघ्र (मदेम) आनन्द करैं ॥६॥
Essence
जो विद्वान् और अविद्वान् लोग परस्पर मैत्री करैं, वे अनादिसिद्ध कल्याणकारक ब्रह्म ऐश्वर्य और विज्ञान को प्राप्त होकर धार्मिक होते हुए दुष्ट व्यसनों का त्याग करके सदा ही सुखी होवें ॥६॥
Subject
जो शिल्पी विद्वानों के साथ और लोग परस्पर मित्रता करें तो क्या पावें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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