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Rigveda Mandal 3 / Sukta 58 / Mantra 4

62 Sukta
9 Mantra
3/58/4
Devata- अश्विनौ Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ म॑न्येथा॒मा ग॑तं॒ कच्चि॒देवै॒र्विश्वे॒ जना॑सो अ॒श्विना॑ हवन्ते। इ॒मा हि वां॒ गोऋ॑जीका॒ मधू॑नि॒ प्र मि॒त्रासो॒ न द॒दुरु॒स्रो अग्रे॑॥

आ । म॒न्ये॒था॒म् । आ । ग॒त॒म् । कत् । चि॒त् । एवैः॑ । विश्वे॑ । जना॑सः । अ॒श्विना॑ । ह॒व॒न्ते॒ । इ॒मा । हि । वा॒म् । गोऽऋ॑जीका । मधू॑नि । प्र । मि॒त्रासः॑ । न । द॒दुः । उ॒स्रः । अग्रे॑ ॥

Mantra without Swara
आ मन्येथामा गतं कच्चिदेवैर्विश्वे जनासो अश्विना हवन्ते। इमा हि वां गोऋजीका मधूनि प्र मित्रासो न ददुरुस्रो अग्रे॥

आ। मन्येथाम्। आ। गतम्। कत्। चित्। एवैः। विश्वे। जनासः। अश्विना। हवन्ते। इमा। हि। वाम्। गोऽऋजीका। मधूनि। प्र। मित्रासः। न। ददुः। उस्रः। अग्रे॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 3 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) अध्यापक और उपेदशक जन ! आप दोनों को (विश्वे) सम्पूर्ण (जनासः) प्रसिद्ध मनुष्य (हवन्ते) ग्रहण करते हैं (अग्रे) और प्रथम (हि) कि जिससे (इमा) इन (गोऋजीका) गौवों के दुग्ध आदि से मिले हुए (मधूनि) सोमलतारूप औषधियों के रसों को (मित्रासः) मित्र लोगों के (न) सदृश (प्र, ददुः) देवें। उनको तथा (उस्रः) गौओं को (वाम्) आप दोनों (एवैः) शीघ्र पहुँचानेवाले बिजुली आदि से चलाये गये वाहनों से (कत्) कब (आ, गतम्) प्राप्त हुए (चित्) भी (आ) सब प्रकार (मन्येथाम्) जानिये ॥४॥
Essence
विद्वानों की योग्यता है कि जो प्रीति से धार्मिक उत्तम सेवक विद्यार्थी वा श्रोताजन समीप आवैं, उनको उत्तम विज्ञान आदि देवैं, जिससे सब मनुष्य सबके साथ मित्रों के सदृश वर्त्ताव करैं ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।