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Rigveda Mandal 3 / Sukta 58 / Mantra 2

62 Sukta
9 Mantra
3/58/2
Devata- अश्विनौ Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सु॒युग्व॑हन्ति॒ प्रति॑ वामृ॒तेनो॒र्ध्वा भ॑वन्ति पि॒तरे॑व॒ मेधाः॑। जरे॑थाम॒स्मद्वि प॒णेर्म॑नी॒षां यु॒वोरव॑श्चकृ॒मा या॑तम॒र्वाक्॥

सु॒ऽयुक् । व॒ह॒न्ति॒ । प्रति॑ । वा॒म् । ऋ॒तेन॑ । ऊ॒र्ध्वा । भ॒व॒न्ति॒ । पि॒तरा॑ऽइव । मेधाः॑ । जरे॑थाम् । अ॒स्मत् । वि । प॒णेः । म॒नी॒षाम् । यु॒वोः । अवः॑ । च॒कृ॒म॒ । आ । या॒त॒म् । अ॒र्वाक् ॥

Mantra without Swara
सुयुग्वहन्ति प्रति वामृतेनोर्ध्वा भवन्ति पितरेव मेधाः। जरेथामस्मद्वि पणेर्मनीषां युवोरवश्चकृमा यातमर्वाक्॥

सुऽयुक्। वहन्ति। प्रति। वाम्। ऋतेन। ऊर्ध्वा। भवन्ति। पितराऽइव। मेधाः। जरेथाम्। अस्मत्। वि। पणेः। मनीषाम्। युवोः। अवः। चकृम। आ। यातम्। अर्वाक्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 3 Mantra » 2

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Meaning
हे अध्यापक और उपदेशक ! (सुयुक्) उत्तम कृत्य के योगकर्त्ता जन जिस (ऊर्ध्वाः) ऊपर को पहुँचानेवाली (मेधाः) बुद्धियों और (ऋतेन) सत्य से (वाम्) आप दोनों को (वहन्ति) प्राप्त होते हैं उनको हम लोगों के (प्रति) प्रति पहुँचाओ जो (पितरेव) माता और पिता के सदृश पालन करनेवाली (भवन्ति) होती हैं आप दोनों (जरेथाम्) उनकी स्तुति करो। (अस्मत्) हमारे लिये (वि, पणेः) व्यवहार की (मनीषाम्) बुद्धि को (आ) सब प्रकार (यातम्) प्राप्त होओ (अर्वाक्) नीचे स्थानों में (युवोः) आप दोनों की (अवः) रक्षा हम लोग (चकृम) करैं ॥२॥
Essence
जैसे वायु और किरणें सूर्य्य आदि को पहुँचाती हैं, वैसे ही उत्तम बुद्धि के सदृश वर्त्तमान स्त्रियाँ सुख को पहुँचाती हैं। और जो विद्वान् लोग मनुष्यों में पिता के सदृश वर्त्तमान हैं, उनके प्रति सबको चाहिये कि पुत्र के सदृश वर्त्ताव कर और सब व्यवहार को जानके यथावत् करैं ॥२॥
Subject
अब ऊर्ध्व और अधःस्थान विषयक शिल्पिजनों के कृत्य को कहते हैं।

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