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Rigveda Mandal 3 / Sukta 58 / Mantra 1

62 Sukta
9 Mantra
3/58/1
Devata- अश्विनौ Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
धे॒नुः प्र॒त्नस्य॒ काम्यं॒ दुहा॑ना॒न्तः पु॒त्रश्च॑रति॒ दक्षि॑णायाः। आ द्यो॑त॒निं व॑हति शु॒भ्रया॑मो॒षसः॒ स्तोमो॑ अ॒श्विना॑वजीगः॥

धे॒नुः । प्र॒त्नस्य॑ । काम्य॑म् । दुहा॑ना । अ॒न्तरिति॑ । पु॒त्रः । च॒र॒ति॒ । दक्षि॑णायाः । आ । द्यो॒त॒निम् । व॒ह॒ति॒ । शु॒भ्रऽया॑मा । उ॒षसः॑ । स्तोमः॑ । अ॒श्विनौ॑ । अ॒जी॒ग॒रिति॑ ॥

Mantra without Swara
धेनुः प्रत्नस्य काम्यं दुहानान्तः पुत्रश्चरति दक्षिणायाः। आ द्योतनिं वहति शुभ्रयामोषसः स्तोमो अश्विनावजीगः॥

धेनुः। प्रत्नस्य। काम्यम्। दुहाना। अन्तरिति। पुत्रः। चरति। दक्षिणायाः। आ। द्योतनिम्। वहति। शुभ्रऽयामा। उषसः। स्तोमः। अश्विनौ। अजीगरिति॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 3 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (शुभ्रयामा) शुद्ध दिन जिससे होते वा जो (प्रत्नस्य) प्राचीन के (काम्यम्) कामना योग्य बोध को (दुहाना) पूर्ण करती हुई (धेनुः) गौ के सदृश वाणी है उस (दक्षिणायाः) ज्ञान को प्राप्त करानेवाली वाणी का (पुत्रः) पुत्र अर्थात् उससे उत्पन्न बोध (अन्तः) मध्य में (चरति) विलसता अर्थात् रहता है (द्योतनिम्) और प्रकाशरूप विद्या को (अश्विनौ) तथा यथार्थवक्ता अध्यापक और उपदेशक को (उषसः) प्रातःकालों के सदृश (आ, वहति) प्राप्त होता वा प्राप्त कराता है और जिससे (स्तोमः) प्रशंसा करने योग्य यथार्थवक्ता अध्यापक और उपदेशक (अजीगः) प्राप्त होता है, उसको आप लोग भी प्राप्त होओ ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य प्रातःकालों को उत्पन्न करता है, वैसे ही आत्मा में उत्पन्न हुआ बोध पूर्ण मनोरथ को उत्पन्न कर सत्य और असत्य का प्रकाश करता है। जो विद्या धर्म से युक्त वा श्रेष्ठ वाणी जिसको प्राप्त होती है, उसको सनातन ब्रह्म का बोध भी प्राप्त होता है ॥१॥
Subject
अब नव ऋचावाले अट्ठावनवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में शिल्पिजन के काम को कहते हैं।