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Rigveda Mandal 3 / Sukta 57 / Mantra 6

62 Sukta
6 Mantra
3/57/6
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- विश्वामित्रः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
या ते॑ अग्ने॒ पर्व॑तस्येव॒ धारास॑श्चन्ती पी॒पय॑द्देव चि॒त्रा। ताम॒स्मभ्यं॒ प्रम॑तिं जातवेदो॒ वसो॒ रास्व॑ सुम॒तिं वि॒श्वज॑न्याम्॥

या । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । पर्व॑तस्यऽइव । धारा॑ । अस॑श्चन्ती । पी॒पय॑त् । दे॒व॒ । चि॒त्रा । ताम् । अ॒स्मभ्य॑म् । प्रऽम॑तिम् । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ । वसो॒ इति॑ । रास्व॑ । सु॒ऽम॒तिम् । वि॒श्वऽज॑न्याम् ॥

Mantra without Swara
या ते अग्ने पर्वतस्येव धारासश्चन्ती पीपयद्देव चित्रा। तामस्मभ्यं प्रमतिं जातवेदो वसो रास्व सुमतिं विश्वजन्याम्॥

या। ते। अग्ने। पर्वतस्यऽइव। धारा। असश्चन्ती। पीपयत्। देव। चित्रा। ताम्। अस्मभ्यम्। प्रऽमतिम्। जातऽवेदः। वसो इति। रास्व। सुऽमतिम्। विश्वऽजन्याम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 2 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) स्त्रि या पुरुष ! (ते) आपकी (या) जो (असश्चन्ती) असम्बन्ध रखती हुई (चित्रा) अद्भुत (पर्वतस्येव) मेघ के (धारा) प्रवाह के सदृश वाणी बुद्धि को (पीपयत्) पीती है (ताम्) उस (प्रमतिम्) उत्तम बुद्धि को और (विश्वजन्याम्) जिससे सम्पूर्ण सन्तान उत्पन्न होता है उस (सुमतिम्) उत्तम बुद्धिवाली स्त्री वा उत्तम बुद्धिवाले पुरुष को आप (रास्व) दीजिये। हे (देव) उत्तम गुणों से युक्त (वसो) सर्वत्र वसते हुए (जातवेदः) उत्पन्न हुए पदार्थों में विद्यमान भगवन् ईश्वर ! आप (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये ऐसी विद्या बुद्धि वाणी और ऐसी स्त्री तथा ऐसे पति के कृपा से दीजिये, जिससे कि हम लोग सदा सुखी होवें ॥६॥
Essence
स्त्री और पुरुषों को चाहिये कि ब्रह्मचर्य्य से विद्या और उत्तम शिक्षाओं को प्राप्त होकर युवावस्था में तुल्य गुण-कर्म और स्वभावों की परीक्षा करके द्विगुण बल और अवस्थावाले पति और प्रेमपात्र स्त्री को प्राप्त होकर गृहाश्रम में सुख से रहें ॥६॥ इस सूक्त में वाणी बुद्धि गृहाश्रम और स्त्री पुरुषों के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह सत्तावनवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग पूरा हुआ ॥
Subject
फिर स्त्री पुरुष के कृत्य को अगले मन्त्र में कहते हैं।