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Rigveda Mandal 3 / Sukta 57 / Mantra 5

62 Sukta
6 Mantra
3/57/5
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- विश्वामित्रः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
या ते॑ जि॒ह्वा मधु॑मती सुमे॒धा अग्ने॑ दे॒वेषू॒च्यत॑ उरू॒ची। तये॒ह विश्वाँ॒ अव॑से॒ यज॑त्रा॒ना सा॑दय पा॒यया॑ चा॒ मधू॑नि॥

या । ते॒ । जि॒ह्वा । मधु॑ऽमती । सु॒ऽमे॒धाः । अग्ने॑ । दे॒वेषु॑ । उ॒च्यते॑ । उ॒रू॒ची । तया॑ । इ॒ह । विश्वा॒न् । अव॑से । यज॑त्रान् । आ । सा॒द॒य॒ । पा॒यया॑ । च॒ । मधू॑नि ॥

Mantra without Swara
या ते जिह्वा मधुमती सुमेधा अग्ने देवेषूच्यत उरूची। तयेह विश्वाँ अवसे यजत्राना सादय पायया चा मधूनि॥

या। ते। जिह्वा। मधुऽमती। सुऽमेधाः। अग्ने। देवेषु। उच्यते। उरूची। तया। इह। विश्वान्। अवसे। यजत्रान्। आ। सादय। पायया। च। मधूनि॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 2 Mantra » 5

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Meaning
हे (अग्ने) विद्वान् पुरुष वा विदुषि स्त्री ! (ते) तुम्हारी (या) जो (देवेषु) विद्वानों में (मधुमती) बहुत सत्यभाषणोंवाली (सुमेधाः) जिसमें उत्तम बुद्धि विद्यमान वह (उरूची) बहुत विद्याओं को प्राप्त होती हुई (जिह्वा) वाणी (उच्यते) कही जाती है (तया) उससे (इह) इस गृहाश्रम में (विश्वान्) सम्पूर्ण (यजत्रान्) मिले हुए श्रेष्ठ पुत्रों को (आ, सादय) प्राप्त कराओ (च) और इनकी (अवसे) रक्षा आदि के लिये (मधूनि) मधुरता से युक्त पीने के योग्य विशेष रसों का (पायय) पान कराओ ॥५॥
Essence
जो स्त्री और पुरुष प्रसन्नता से विवाह किये हुए विद्या बुद्धि और उत्तम वाणी से युक्त इस संसार में गृहाश्रम में वर्त्तमान होकर प्रेम से उत्पन्न होनेवाले पुत्रों को उत्पन्न पालन और उत्तम शिक्षायुक्त करके तथा स्वयंवर विवाह कराके निवास कराते हैं, वे ही गृहाश्रम में मोक्ष के सदृश सुखका अनुभव करते हैं ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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