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Rigveda Mandal 3 / Sukta 56 / Mantra 8

62 Sukta
8 Mantra
3/56/8
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्रिरु॑त्त॒मा दू॒णशा॑ रोच॒नानि॒ त्रयो॑ राज॒न्त्यसु॑रस्य वी॒राः। ऋ॒तावा॑न इषि॒रा दू॒ळभा॑स॒स्त्रिरा दि॒वो वि॒दथे॑ सन्तु दे॒वाः॥

त्रिः । उ॒त्ऽत॒मा दुः॒ऽनशा॑ । रो॒च॒नानि॑ । त्रयः॑ । रा॒ज॒न्ति॒ । असु॑रस्य । वी॒राः । ऋ॒तऽवा॑नः । इ॒षि॒राः । दुः॒ऽदभा॑सः । त्रिः । आ । दि॒वः । वि॒दथे॑ । स॒न्तु॒ । दे॒वाः ॥

Mantra without Swara
त्रिरुत्तमा दूणशा रोचनानि त्रयो राजन्त्यसुरस्य वीराः। ऋतावान इषिरा दूळभासस्त्रिरा दिवो विदथे सन्तु देवाः॥

त्रिः। उत्ऽतमा दुःऽनशा। रोचनानि। त्रयः। राजन्ति। असुरस्य। वीराः। ऋतऽवानः। इषिराः। दुःऽदभासः। त्रिः। आ। दिवः। विदथे। सन्तु। देवाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 8

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो ब्रह्म के भक्त (त्रयः) बिजुली प्रसिद्ध अग्नि और सूर्य्याग्नि के सदृश (असुरस्य) दुष्ट और दोषों के दूर करनेवाले के सम्बन्ध में (इषिराः) जानेवाले (ऋतावानः) प्रशंसित सत्य जिनमें विद्यमान तथा (वीराः) विद्या शूरता और बल से परिपूरित वे (दूळभासः) हिंसा से रहित (आ) सब प्रकार (दिवः) कामना करते हुए (देवाः) विद्वान् लोग (विदथे) संग्राम आदि व्यवहार में (त्रिः) तीन बार (सन्तु) प्रसिद्ध हों और (दूणशा) दुःख से जिनका नाश होता है वे (उत्तमा) श्रेष्ठ (रोचनानि) प्रकाशमान (त्रिः) तीन बार (राजन्ति) शोभित होते हैं ॥८॥
Essence
जो लोग जगदीश्वर को प्राणों के सदृश प्रिय, राजा के सदृश उपदेशदाता, न्यायाधीश के सदृश नायक, सूर्य के सदृश अपने से प्रकाशमान और सबका प्रकाशकर्त्ता मान निरन्तर भजते हैं, वे ही शत्रुओं के दुःख से जीतने योग्य सत्य के आचरण करने और अन्यों के सुख चाहनेवाले हैं, वे चक्रवर्त्ती राज्य को प्राप्त होकर सूर्य्य के सदृश शोभित होते हैं और वे ही इस संसार में रक्षा के अधिकारी हों ॥८॥ इस सूक्त में ईश्वर, जगत् और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।