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Rigveda Mandal 3 / Sukta 56 / Mantra 7

62 Sukta
8 Mantra
3/56/7
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्रिरा दि॒वः स॑वि॒ता सो॑षवीति॒ राजा॑ना मि॒त्रावरु॑णा सुपा॒णी। आप॑श्चिदस्य॒ रोद॑सी चिदु॒र्वी रत्नं॑ भिक्षन्त सवि॒तुः स॒वाय॑॥

त्रिः । आ । दि॒वः । स॒वि॒ता । सो॒ष॒वी॒ति॒ । राजा॑ना । मि॒त्रावरु॑णा । सु॒पा॒णी इति॑ सु॒ऽपा॒णी । आपः॑ । चि॒त् । अ॒स्य॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । चि॒त् । उ॒र्वी इति॑ । रत्न॑म् । भि॒क्ष॒न्त॒ । स॒वि॒तुः । स॒वाय॑ ॥

Mantra without Swara
त्रिरा दिवः सविता सोषवीति राजाना मित्रावरुणा सुपाणी। आपश्चिदस्य रोदसी चिदुर्वी रत्नं भिक्षन्त सवितुः सवाय॥

त्रिः। आ। दिवः। सविता। सोषवीति। राजाना। मित्रावरुणा। सुपाणी इति सुऽपाणी। आपः। चित्। अस्य। रोदसी इति। चित्। उर्वी इति। रत्नम्। भिक्षन्त। सवितुः। सवाय॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 7

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (सविता) प्रेरणा करनेवाला अन्तर्य्यामी (मित्रावरुणा) प्राण और उदान वायु के सदृश सबके मित्र (सुपाणी) और सुन्दर जिनके हाथ ऐसे (राजाना) विद्या और विनय से प्रकाशमान नरों के समान (दिवः) प्रकाश से (त्रिः, आ, सोषवीति) तीन बार सब ओर से निरन्तर प्रेरणा देता है (अस्य) इस (सवितुः) सम्पूर्ण ऐश्वर्य्ययुक्त जगदीश्वर के समीप से (सवाय) ऐश्वर्य्य के लिये (आपः) प्राणों के (चित्) सदृश (उर्वी) बहुत (रोदसी) प्रकाशित और अप्रकाशित जगत् और (रत्नम्) सुन्दर धन की (चित्) भी सब लोग (भिक्षन्त) याचना करते हैं ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा लोग परमेश्वर के सदृश गुण-कर्म और स्वभावयुक्त हुए प्रजाओं में वर्त्तमान हैं, वे ही चक्रवर्त्ति राज्य और असङ्ख्य धन को प्राप्त होते हैं ॥७॥
Subject
अब राजप्रस्ताव से विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।