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Rigveda Mandal 3 / Sukta 56 / Mantra 6

62 Sukta
8 Mantra
3/56/6
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्रिरा दि॒वः स॑वित॒र्वार्या॑णि दि॒वेदि॑व॒ आ सु॑व॒ त्रिर्नो॒ अह्नः॑। त्रि॒धातु॑ रा॒य आ सु॑वा॒ वसू॑नि॒ भग॑ त्रातर्धिषणे सा॒तये॑ धाः॥

त्रिः । आ । दि॒वः । स॒वि॒तः॒ । वार्या॑णि । दि॒वेऽदि॑वे । आ । सु॒व॒ । त्रिः । नः॒ । अह्नः॑ । त्रि॒ऽधातु॑ । रा॒यः । आ । सु॒व॒ । वसू॑नि भग॑ । त्रा॒तः॒ । धि॒ष॒णे॒ । सा॒तये॑ । धाः॒ ॥

Mantra without Swara
त्रिरा दिवः सवितर्वार्याणि दिवेदिव आ सुव त्रिर्नो अह्नः। त्रिधातु राय आ सुवा वसूनि भग त्रातर्धिषणे सातये धाः॥

त्रिः। आ। दिवः। सवितः। वार्याणि। दिवेऽदिवे। आ। सुव। त्रिः। नः। अह्नः। त्रिऽधातु। रायः। आ। सुव। वसूनि भग। त्रातः। धिषणे। सातये। धाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 6

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Meaning
हे (सवितः) ऐश्वर्य के देनेवाले आप (दिवेदिवे) प्रतिदिन (नः) हम लोगों के लिये (दिवः) कामना करने योग्य क्रियाओं को (वार्याणि) ग्रहण करने योग्य ऐश्वर्यों को (त्रिः) तीन बार (आसुव) उत्पन्न करो हे (भग) अत्यन्त भजने योग्य (अह्नः) दिन के मध्य में (रायः) धनों को (त्रिः) तीन बार (आसुव) उत्पन्न करो और (त्रातः) हे रक्षा करनेवाले (सातये) उत्तम प्रकार विभाग के लिये (त्रिधातु) सुवर्ण और चाँदी आदि धातु जिनमें ऐसे (वसूनि) धनों और (धिषणे) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (आ, धाः) सब प्रकार धारण करो ॥६॥
Essence
हे जगदीश्वर ! आप कृपा से हम लोगों को धर्म से पुरुषार्थयुक्त करके प्रतिदिन ऐश्वर्य्य प्राप्त कराओ और निरन्तर रक्षा करके सबके सुख के लिये विभागों को कराओ ॥६॥
Subject
अब ईश्वर की प्रार्थना के साथ जगद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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