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Rigveda Mandal 3 / Sukta 56 / Mantra 5

62 Sukta
8 Mantra
3/56/5
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्री ष॒धस्था॑ सिन्धव॒स्त्रिः क॑वी॒नामु॒त त्रि॑मा॒ता वि॒दथे॑षु स॒म्राट्। ऋ॒ताव॑री॒र्योष॑णास्ति॒स्रो अप्या॒स्त्रिरा दि॒वो वि॒दथे॒ पत्य॑मानाः॥

त्री । ष॒धऽस्था॑ । सि॒न्ध॒वः॒ । त्रिः । क॒वी॒नाम् । उ॒त । त्रि॒ऽमा॒ता । वि॒दथे॑षु । स॒म्ऽराट् । ऋ॒तऽव॑रीः । योष॑णाः । ति॒स्रः । अप्याः॑ । त्रिः । आ । दि॒वः । वि॒दथे॑ । पत्य॑मानाः ॥

Mantra without Swara
त्री षधस्था सिन्धवस्त्रिः कवीनामुत त्रिमाता विदथेषु सम्राट्। ऋतावरीर्योषणास्तिस्रो अप्यास्त्रिरा दिवो विदथे पत्यमानाः॥

त्री। षधऽस्था। सिन्धवः। त्रिः। कवीनाम्। उत। त्रिऽमाता। विदथेषु। सम्ऽराट्। ऋतऽवरीः। योषणाः। तिस्रः। अप्याः। त्रिः। आ। दिवः। विदथे। पत्यमानाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो जगदीश्वर (त्री) तीन (सधस्था) साथ के स्थान (सिन्धवः) नदियाँ (उत) और (कवीनाम्) विद्वानों के (त्रिः) तीनबार (त्रिमाता) जन्म, स्थान और नाम इन तीनों को उत्पन्न करनेवाला (विदथेषु) वा जो संग्रामों और जानने योग्य व्यवहारों में (सम्राट्) उत्तम प्रकार भूमि में प्रकाशित है ऐसे पुरुष के सदृश (ऋतावरीः) जिनमें सत्य विद्यमान (योषणाः) जो स्त्रियों के सदृश वर्त्तमान (तिस्रः) स्थूल सूक्ष्म और कारण नामक (अप्याः) अन्तरिक्ष में होनेवाली सृष्टियाँ (विदथे) संग्राम में (पत्यमानाः) पति के सदृश आचरण करती हुई हैं उनको (त्रिः) तीनबार और (दिवः) तारागणों को रचता है, वही सबका स्वामी है ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जिस परमात्मा ने सब प्राणी और प्राणिभिन्नों के निवास के लिये जल स्थल और अन्तरिक्ष रचे, उस स्वामी की पतिव्रता स्त्री के सदृश निरन्तर सेवा करो ॥५॥
Subject
अब सबके निवास के लिये ईश्वर ने जगत् बनाया, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।