Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 3 / Sukta 56 / Mantra 4

62 Sukta
8 Mantra
3/56/4
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒भीक॑ आसां पद॒वीर॑बोध्यादि॒त्याना॑मह्वे॒ चारु॒ नाम॑। आप॑श्चिदस्मा अरमन्त दे॒वीः पृथ॒ग्व्रज॑न्तीः॒ परि॑ षीमवृञ्जन्॥

अ॒भीके॑ । आ॒सा॒म् । प॒द॒ऽवीः । अ॒बो॒धि॒ । आ॒दि॒त्याना॑म् । अ॒ह्वे॒ । चारु॑ । नाम॑ । आपः॑ । चि॒त् । अ॒स्मै॒ । अ॒र॒म॒न्त॒ । दे॒वीः । पृथ॑क् । व्रज॑न्तीः । परि॑ । सी॒म् । अ॒वृ॒ञ्ज॒न् ॥

Mantra without Swara
अभीक आसां पदवीरबोध्यादित्यानामह्वे चारु नाम। आपश्चिदस्मा अरमन्त देवीः पृथग्व्रजन्तीः परि षीमवृञ्जन्॥

अभीके। आसाम्। पदऽवीः। अबोधि। आदित्यानाम्। अह्वे। चारु। नाम। आपः। चित्। अस्मै। अरमन्त। देवीः। पृथक्। व्रजन्तीः। परि। सीम्। अवृञ्जन्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जिस जगदीश्वर ने (आसाम्) इन अनादि काल से सिद्ध प्रजाओं और (आदित्यानाम्) सूर्य्यादिकों वा मास आदि समय विभागों के (पदवीः) पदों को जो व्याप्त होता वह (अबोधि) जाना हुआ है और जिसका (चारु) अत्यन्त श्रेष्ठ (नाम) नाम जिसमें (चित्) निश्चित (व्रजन्तीः) जाते हुए (देवीः) प्रकाशमान (आपः) प्राण (सीम्) परिग्रह करने में (पृथक्) अलग-अलग (परि, अरमन्त) सब ओर से रमते और (अवृञ्जन्) त्याग करते हैं (अस्मै) इसके लिये (अभीके) कामना करनेवाले में वर्त्तमान मैं इस ईश्वर को (अह्वे) बुलाता हूँ, उसीको आप लोग भी बुलाओ ॥४॥
Essence
हे मनुष्या जो सबके सुख की कामना करता है, जिसमें सब जीव और लोकादि पदार्थ पृथक्-पृथक् क्रीड़ा करते ग्रहण करते और त्याग करते हैं, उसको छोड़ के अन्य किसी की भी मत उपासना करो ॥४॥
Subject
फिर भी ईश्वर के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में कहते हैं।