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Rigveda Mandal 3 / Sukta 56 / Mantra 1

62 Sukta
8 Mantra
3/56/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न ता मि॑नन्ति मा॒यिनो॒ न धीरा॑ व्र॒ता दे॒वानां॑ प्रथ॒मा ध्रु॒वाणि॑। न रोद॑सी अ॒द्रुहा॑ वे॒द्याभि॒र्न पर्व॑ता नि॒नमे॑ तस्थि॒वांसः॑॥

न । ता । मि॒न॒न्ति॒ । मा॒यिनः॑ । न । धीराः॑ । व्र॒ता । दे॒वाना॑म् । प्र॒थ॒मा । ध्रु॒वाणि॑ । न । रोद॑सी॒ इति॑ । अ॒द्रुहा॑ । वे॒द्याभिः॑ । न । पर्व॑ताः । नि॒ऽनमे॑ । त॒स्थि॒ऽवांसः॑ ॥

Mantra without Swara
न ता मिनन्ति मायिनो न धीरा व्रता देवानां प्रथमा ध्रुवाणि। न रोदसी अद्रुहा वेद्याभिर्न पर्वता निनमे तस्थिवांसः॥

न। ता। मिनन्ति। मायिनः। न। धीराः। व्रता। देवानाम्। प्रथमा। ध्रुवाणि। न। रोदसी इति। अद्रुहा। वेद्याभिः। न। पर्वताः। निऽनमे। तस्थिऽवांसः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 1 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! ईश्वर ने (देवानाम्) यथार्थवादी विद्वानों के जो (प्रथमा) आदि में वर्त्तमान (ध्रुवाणि) अखण्डित (व्रता) उत्तम कर्म उपदेश किये गये वा रचे गये (ता) उनका (मायिनः) निन्दित बुद्धिवाले (न) नहीं (मिनन्ति) नाश करते हैं (धीराः) ध्यान करनेवाले श्रेष्ठ पुरुष नहीं नाश करते हैं (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी (न) नहीं नाश करते हैं (अद्रुहा) द्रोह से रहित अध्यापक और उपदेशक (न) नहीं नाश करते हैं (वेद्याभिः) जानने के योग्य प्रजाओं के साथ (निनमे) नवने के योग्य स्थान में (तस्थिवांसः) स्थित होते हुए (पर्वताः) पर्वत (न) नहीं नाश करते हैं, उनको आप जान के आचरण करो ॥१॥
Essence
किसी का भी सामर्थ्य नहीं है कि जो ईश्वर के किये हुए नियमों का उल्लङ्घन करै और जिस परमेश्वर के भ्रमरहित सुखरूप कर्म हैं, उसी दयानिधि परमेश्वर की सब लोग उपासना करो ॥१॥
Subject
अब छप्पनवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में ईश्वर के गुणों को कहते हैं।

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