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Rigveda Mandal 3 / Sukta 55 / Mantra 6

62 Sukta
22 Mantra
3/55/6
Devata- विश्वेदेवा, अग्निः Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
श॒युः प॒रस्ता॒दध॒ नु द्वि॑मा॒ताऽब॑न्ध॒नश्च॑रति व॒त्स एकः॑। मि॒त्रस्य॒ ता वरु॑णस्य व्र॒तानि॑ म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

श॒युः । प॒रस्ता॑त् । अध॑ । नु । द्विऽमा॒ता । अ॒ब॒न्ध॒नः । च॒र॒ति॒ । व॒त्सः । एकः॑ । मि॒त्रस्य॑ । ता । वरु॑णस्य । व्र॒तानि॑ । म॒हत् । दे॒वाना॑म् । अ॒सु॒र॒ऽत्वम् । एक॑म् ॥

Mantra without Swara
शयुः परस्तादध नु द्विमाताऽबन्धनश्चरति वत्स एकः। मित्रस्य ता वरुणस्य व्रतानि महद्देवानामसुरत्वमेकम्॥

शयुः। परस्तात्। अध। नु। द्विऽमाता। अबन्धनः। चरति। वत्सः। एकः। मित्रस्य। ता। वरुणस्य। व्रतानि। महत्। देवानाम्। असुरऽत्वम्। एकम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 29 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (परस्तात्) दूसरे देश में (शयुः) व्याप्त होकर शयन करनेवाला (द्विमाता) दो वायु और आकाश माता हैं जिस अग्नि के वह (अबन्धनः) जो बन्धनरहित वह (वत्सः) पुत्र के सदृश वर्त्तमान (एकः) सहायरहित (नु, चरति) शीघ्र चलता है (अध) इसके अनन्तर जो (देवानाम्) विद्वानों का (महत्) बड़ा (एकम्) सहायरहित तेज (असुरत्वम्) फेंकनापन (ता) वे (व्रतानि) सत्यभाषण आदि कर्म (मित्रस्य) मित्र और (वरुणस्य) सबमें उत्तम और संसार के प्रबन्ध करनेवाले परमात्मा के हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥६॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो कुछ इस संसार में सूर्य्य आदि वस्तु और जो इस संसार में अनेक प्रकार की रचना हैं और जो विचित्ररूप स्वाद आदि वर्त्तमान है और सब अपने-अपने मण्डल में घूमते हैं, प्रलय से प्रथम नहीं नष्ट होते हैं, वे ये परमात्मा के कर्म हैं, यह जानना चाहिये ॥६॥

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