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Rigveda Mandal 3 / Sukta 55 / Mantra 22

62 Sukta
22 Mantra
3/55/22
Devata- विश्वेदेवा, इन्द्रः पर्जन्यात्मा त्वष्टा वाग्निश्च Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नि॒ष्षिध्व॑रीस्त॒ ओष॑धीरु॒तापो॑ र॒यिं त॑ इन्द्र पृथि॒वी बि॑भर्ति। सखा॑यस्ते वाम॒भाजः॑ स्याम म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

निः॒ऽसिध्व॑रीः । ते॒ । ओष॑धीः । उ॒त । आपः॑ । र॒यिम् । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । पृ॒थि॒वी । बि॒भ॒र्ति॒ । सखा॑यः । ते॒ । वा॒म॒ऽभाजः॑ । स्या॒म॒ । म॒हत् । दे॒वाना॑म् । अ॒सु॒र॒ऽत्वम् । एक॑म् ॥

Mantra without Swara
निष्षिध्वरीस्त ओषधीरुतापो रयिं त इन्द्र पृथिवी बिभर्ति। सखायस्ते वामभाजः स्याम महद्देवानामसुरत्वमेकम्॥

निःऽसिध्वरीः। ते। ओषधीः। उत। आपः। रयिम्। ते। इन्द्र। पृथिवी। बिभर्ति। सखायः। ते। वामऽभाजः। स्याम। महत्। देवानाम्। असुरऽत्वम्। एकम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 31 Mantra » 7

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Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देनेवाले ईश्वर जैसे (ते) आपकी सृष्टि में (पृथिवी) भूमि (निष्षिध्वरीः) अत्यन्त मङ्गल करनेवाली (ओषधीः) सोमलता आदि ओषधियों को (बिभर्त्ति) धारण वा पोषण करती है। (उत) और (ते) आपके (आपः) जल (रयिम्) लक्ष्मी को धारण करते हैं उसी (देवानाम्) सूर्य्य आदिकों में (महत्) सबसे बड़े (एकम्) द्वितीयरहित (असुरत्वम्) शत्रुओं के नाश करनेवाले को प्राप्त होकर (ते) आपके (वामभाजः) उत्तम कर्मों के सेवन करने वा श्रेष्ठ भोग भोगनेवाले (सखायः) मित्र हम लोग (स्याम) होवें ॥२२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे जगदीश्वर ! जिन आपने हम लोगों के सुख के लिये सृष्टि में अनेक प्रकार की ओषधियाँ और जल रचे, उन आपके हम लोग उपासना करनेवाले होवें और आपको छोड़ के दूसरे की उपासना कभी न करें ॥२२॥ इस सूक्त में दिन, रात्रि, विद्वान्, अन्तरिक्ष, पृथिवी, राजधर्म और ईश्वर के गुणवर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के संगति जाननी चाहिये ॥ यह ऋग्वेद की संहिता के तीसरे अष्टक में तीसरा अध्याय इकतीसवाँ वर्ग और तीसरे मण्डल में पचपनवाँ सूक्त समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।