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Rigveda Mandal 3 / Sukta 55 / Mantra 20

62 Sukta
22 Mantra
3/55/20
Devata- विश्वेदेवा, इन्द्रः पर्जन्यात्मा त्वष्टा वाग्निश्च Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
म॒ही समै॑रच्च॒म्वा॑ समी॒ची उ॒भे ते अ॑स्य॒ वसु॑ना॒ न्यृ॑ष्टे। शृ॒ण्वे वी॒रो वि॒न्दमा॑नो॒ वसू॑नि म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

म॒ही । सम् । ऐ॒र॒त् । च॒म्वा॑ । स॒मी॒ची इति॑ स॒म्ऽई॒ची । उ॒भे । ते । अ॒स्य॒ । वसु॑ना । न्यृ॑ष्टे॒ इति॒ निऽऋ॑ष्टे । शृ॒ण्वे । वी॒रः । वि॒न्दमा॑नः । वसू॑नि । म॒हत् । दे॒वाना॑म् । अ॒सु॒र॒ऽत्वम् । एक॑म् ॥

Mantra without Swara
मही समैरच्चम्वा समीची उभे ते अस्य वसुना न्यृष्टे। शृण्वे वीरो विन्दमानो वसूनि महद्देवानामसुरत्वमेकम्॥

मही। सम्। ऐरत्। चम्वा। समीची इति सम्ऽईची। उभे। ते। अस्य। वसुना। न्यृष्टे इति निऽऋष्टे। शृण्वे। वीरः। विन्दमानः। वसूनि। महत्। देवानाम्। असुरऽत्वम्। एकम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 31 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो जगदीश्वर (ते) उन (उभे) दोनों (मही) बड़ी (समीची) उत्तम प्रकार प्राप्त अन्तरिक्ष और पृथिवी को (चम्वा) सेना से जैसे वैसे (सम्, ऐरत्) प्रेरणा करता है वह दोनों (अस्य) इसके (वसुना) द्रव्यों के साथ (न्यृष्टे) निश्चित स्वरूप को प्राप्त हुई हैं (देवानाम्) विद्वानों के उस (महत्) बड़े (एकम्) एक (असुरत्वम्) दोषों के दूर करनेवाले को और (वसूनि) धनों को (विन्दमानः) प्राप्त होता हुआ (वीरः) बल से युक्त मैं ब्रह्म का नित्य (शृण्वे) श्रवण करूँ, उसको आप लोग भी निरन्तर सुनके उन सबों को प्राप्त हूजिये ॥२०॥
Essence
कोई भी पुरुष परमेश्वर की आज्ञापालन के विना बड़े ऐश्वर्य्य को नहीं प्राप्त होता है और यथार्थवक्ता पुरुषों से सुनने विना परमात्मा का बोध किसी को भी नहीं प्राप्त होता है, जिससे सब लोगों को चाहिये कि परमेश्वर की आज्ञा का पालन करके ऐश्वर्य्यवान् होवें ॥२०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।