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Rigveda Mandal 3 / Sukta 55 / Mantra 17

62 Sukta
22 Mantra
3/55/17
Devata- विश्वेदेवा, इन्द्रः पर्जन्यात्मा त्वष्टा वाग्निश्च Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यद॒न्यासु॑ वृष॒भो रोर॑वीति॒ सो अ॒न्यस्मि॑न्यू॒थे नि द॑धाति॒ रेतः॑। स हि क्षपा॑वा॒न्त्स भगः॒ स राजा॑ म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

यत् । अ॒न्यासु॑ । वृ॒ष॒भः । रोर॑वीति । सः । अ॒न्यस्मि॑न् । यू॒थे । नि । द॒धा॒ति॒ । रेतः॑ । सः । हि । क्षपा॑ऽवान् । सः । भगः॑ । सः । राजा॑ । म॒हत् । दे॒वाना॑म् । अ॒सु॒र॒ऽत्वम् । एक॑म् ॥

Mantra without Swara
यदन्यासु वृषभो रोरवीति सो अन्यस्मिन्यूथे नि दधाति रेतः। स हि क्षपावान्त्स भगः स राजा महद्देवानामसुरत्वमेकम्॥

यत्। अन्यासु। वृषभः। रोरवीति। सः। अन्यस्मिन्। यूथे। नि। दधाति। रेतः। सः। हि। क्षपाऽवान्। सः। भगः। सः। राजा। महत्। देवानाम्। असुरऽत्वम्। एकम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 31 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
(यत्) जो (वृषभः) बलयुक्त सूर्य्य (अन्यासु) रात्रि और प्रातःकालों में (रोरवीति) अत्यन्त शब्द करता है (सः) वह (अन्यस्मिन्) अन्य (यूथे) समूह में चन्द्र आदिकों में (रेतः) पराक्रम का (निदधाति) स्थापन करता है। (हि) जिससे कि (सः) वह (क्षपावान्) रात्रिवान् अर्थात् रात्रि जिसकी सम्बन्धिनी होती और (सः) वह (भगः) ऐश्वर्य्यों का दाता सूर्य्य तथा (सः) वह (राजा) प्रकाशमान होता (देवानाम्) विद्वानों में (महत्) बड़ा (एकम्) एक यह (असुरत्वम्) दोषों के दूर करनेवाला प्राप्त होने योग्य गुण होता है ॥१७॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो सूर्य्य रात्रि के अन्त और दिन के आदि में सब प्राणियों को निरन्तर जगाय के शब्द कराय और व्यवहार कराय के लक्ष्मियों को प्राप्त कराता है और रात्रि में चन्द्र आदिकों में किरणों को रख के प्रकाश कराता सो यह प्रकाशमान जगदीश्वर से उत्पन्न किया गया, ऐसा जानना चाहिये ॥१७॥