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Rigveda Mandal 3 / Sukta 55 / Mantra 15

62 Sukta
22 Mantra
3/55/15
Devata- विश्वेदेवा, रोदसी द्युनिशो वा Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प॒देइ॑व॒ निहि॑ते द॒स्मे अ॒न्तस्तयो॑र॒न्यद्गुह्य॑मा॒विर॒न्यत्। स॒ध्री॒ची॒ना प॒थ्या॒३॒॑ सा विषू॑ची म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

प॒देइ॒वेति॑ प॒देऽइ॑व । निहि॑ते॒ इति॒ निऽहि॑ते । द॒स्मे । अ॒न्तरिति॑ । तयोः॑ । अ॒न्यत् । गुह्य॑म् । आ॒विः । अ॒न्यत् । स॒ध्री॒ची॒ना । प॒थ्या॑ । सा । विषू॑ची । म॒हत् । दे॒वाना॑म् । अ॒सु॒र॒ऽत्वम् । एक॑म् ॥

Mantra without Swara
पदेइव निहिते दस्मे अन्तस्तयोरन्यद्गुह्यमाविरन्यत्। सध्रीचीना पथ्या३ सा विषूची महद्देवानामसुरत्वमेकम्॥

पदेइवेति पदेऽइव। निहिते इति निऽहिते। दस्मे। अन्तरिति। तयोः। अन्यत्। गुह्यम्। आविः। अन्यत्। सध्रीचीना। पथ्या। सा। विषूची। महत्। देवानाम्। असुरऽत्वम्। एकम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 30 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! (देवानाम्) विद्वानों का जो (महत्) बड़ा (एकम्) द्वितीयरहित (असुरत्वम्) दोषों का दूर करनेवाला है और जिससे (दस्मे) नाश होनेवाले (पदेइव) पैरों के सदृश (निहिते) धारण किये गये रात्रि और दिन वर्त्तमान हैं जो अन्य (सध्रीचीना) एक साथ सेवन करती हुई (पथ्या) अपनी कक्षा को त्याग के अन्यत्र नहीं जानेवाली (सा) वह (विषूची) व्याप्त पदार्थों का सेवन करती है (तयोः) उनके (अन्तः) मध्य में (अन्यत्) दूसरा (गुह्यम्) गुप्त (अन्यत्) अन्य (आविः) रक्षा करनेवाला है, उस सबको जानो ॥१५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य लोग दो पैरों से चलते हैं, वैसे ही रात्रि और दिन चलते हैं और जैसे दिन पथ्य है, वैसे रात्रि पथ्य नहीं होती है। इसी प्रकार सर्वान्तर्यामी ब्रह्म को त्याग करके अन्य उपासित हुआ पथ्य नहीं होता है ॥१५॥

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