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Rigveda Mandal 3 / Sukta 55 / Mantra 14

62 Sukta
22 Mantra
3/55/14
Devata- विश्वेदेवा, रोदसी Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पद्या॑ वस्ते पुरु॒रूपा॒ वपूं॑ष्यू॒र्ध्वा त॑स्थौ॒ त्र्यविं॒ रेरि॑हाणा। ऋ॒तस्य॒ सद्म॒ वि च॑रामि वि॒द्वान्म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

पद्या॑ । व॒स्ते॒ । पु॒रु॒ऽरूपा॑ । वपूं॑षि । ऊ॒र्ध्वा । त॒स्थौ॒ । त्रि॒ऽअवि॑म् । रेरि॑हाणा । ऋ॒तस्य॑ । सद्म॑ । वि । च॒रा॒मि॒ । वि॒द्वान् । म॒हत् । दे॒वाना॑म् । अ॒सु॒र॒ऽत्वम् । एक॑म् ॥

Mantra without Swara
पद्या वस्ते पुरुरूपा वपूंष्यूर्ध्वा तस्थौ त्र्यविं रेरिहाणा। ऋतस्य सद्म वि चरामि विद्वान्महद्देवानामसुरत्वमेकम्॥

पद्या। वस्ते। पुरुऽरूपा। वपूंषि। ऊर्ध्वा। तस्थौ। त्रिऽअविम्। रेरिहाणा। ऋतस्य। सद्म। वि। चरामि। विद्वान्। महत्। देवानाम्। असुरऽत्वम्। एकम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 30 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (विद्वान्) विद्यायुक्त मैं जो (ऋतस्य) सत्य और (देवानाम्) विद्वानों में (महत्) बड़े (एकम्) द्वितीयरहित (सद्म) स्थान और (असुरत्वम्) दोषों के दूर करनेवाले को (वि, चरामि) प्राप्त होता हूँ उससे नियमित (पद्या) अंशों में होनेवाली रात्रि सबको (वस्ते) आच्छादित करती घेरती है। अन्या (त्र्यविम्) कार्य्य कारण और जीव नामक तीन वस्तुओं की रक्षा करनेवाले और (वपूंषि) रूपों को (रेरिहाणा) अत्यन्त चाटती हुई (ऊर्ध्वा) उत्तम (पुरुरूपा) बहुत रूप युक्त प्रातःकाल (तस्थौ) स्थित है उसको वे और आप लोग जानें ॥१४॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे दिन अनेक रूपों को दिखाता है, वैसे ही रात्रि सबको घेरती है, ये ही सत्य के कारण से उत्पन्न हुए और उत्पन्न होनेवाले को जानकर सबके बनानेवाले परमेश्वर को सुखपूर्वक जानो ॥१४॥