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Rigveda Mandal 3 / Sukta 55 / Mantra 12

62 Sukta
22 Mantra
3/55/12
Devata- विश्वेदेवा, रोदसी Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मा॒ता च॒ यत्र॑ दुहि॒ता च॑ धे॒नू स॑ब॒र्दुघे॑ धा॒पये॑ते समी॒ची। ऋ॒तस्य॒ ते सद॑सीळे अ॒न्तर्म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

मा॒ता । च॒ । यत्र॑ । दु॒हि॒ता । च॒ । धे॒नू इति॑ । स॒ब॒र्दुघे॒ इति॑ स॒बः॒ऽदुघे॑ । धा॒पये॑ते॒ इति॑ । स॒मी॒ची इति॑ स॒म्ऽई॒ची । ऋ॒तस्य॑ । ते॒ । सद॑सि । ई॒ळे॒ । अ॒न्तः । म॒हत् । दे॒वाना॑म् । अ॒सु॒र॒ऽत्वम् । एक॑म् ॥

Mantra without Swara
माता च यत्र दुहिता च धेनू सबर्दुघे धापयेते समीची। ऋतस्य ते सदसीळे अन्तर्महद्देवानामसुरत्वमेकम्॥

माता। च। यत्र। दुहिता। च। धेनू इति। सबर्दुघे इति सबःऽदुघे। धापयेते इति। समीची इति सम्ऽईची। ऋतस्य। ते। सदसि। ईळे। अन्तः। महत्। देवानाम्। असुरऽत्वम्। एकम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 30 Mantra » 2

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Meaning
हे राजन् ! मैं (ते) आपकी (सदसि) सभा में जैसे (यत्र) जिस समय (माता) मान को देनेवाली माता के सदृश रात्रि (च) और (दुहिता) कन्या के सदृश प्रातःकाल (च) और (समीची) उत्तम प्रकार प्राप्त होती हुईं (सबर्दुघे) पालन करनेवाले दुग्ध आदि के सदृश रस की पूर्ति करने और (धेनू) धेनू के सदृश रस को देनेवाली (ऋतस्य) जल के सदृश सत्य के सम्बन्ध से (धापयेते) पिलाती हैं वैसे ही सभा के (अन्तः) मध्य में वर्त्तमान हुआ (ऋतस्य) जल के सदृश सत्य का (देवानाम्) श्रेष्ठ विद्वानों में (महत्) बड़े (एकम्) द्वितीयरहित (असुरत्वम्) दोषों को दूर करनेवाले की (ईळे) स्तुति करता हूँ ॥१२॥
Essence
जो सभ्य जन परमेश्वर से डर के उसकी आज्ञा के अनुसार जैसे रात्रि और दिन संपूर्ण संसार के नियमपूर्वक पालनकर्त्ता होते हैं, वैसे ही सभा में धर्म के विजय और अधर्म के पराजय से प्रजाओं को आनन्दित करें ॥१२॥

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