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Rigveda Mandal 3 / Sukta 55 / Mantra 11

62 Sukta
22 Mantra
3/55/11
Devata- विश्वेदेवा, अहोरात्री Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नाना॑ चक्राते य॒म्या॒३॒॑ वपूं॑षि॒ तयो॑र॒न्यद्रोच॑ते कृ॒ष्णम॒न्यत्। श्यावी॑ च॒ यदरु॑षी च॒ स्वसा॑रौ म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

नाना॑ । च॒क्रा॒ते॒ इति॑ । य॒म्या॑ । वपूं॑षि । तयोः॑ । अ॒न्यत् । रोच॑ते । कृ॒ष्णम् । अ॒न्यत् । श्यावी॑ । च॒ । यत् । अरु॑षी । च॒ । स्वसा॑रौ । म॒हत् । दे॒वाना॑म् । अ॒सु॒र॒ऽत्वम् । एक॑म् ॥

Mantra without Swara
नाना चक्राते यम्या३ वपूंषि तयोरन्यद्रोचते कृष्णमन्यत्। श्यावी च यदरुषी च स्वसारौ महद्देवानामसुरत्वमेकम्॥

नाना। चक्राते इति। यम्या। वपूंषि। तयोः। अन्यत्। रोचते। कृष्णम्। अन्यत्। श्यावी। च। यत्। अरुषी। च। स्वसारौ। महत्। देवानाम्। असुरऽत्वम्। एकम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 30 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (देवानाम्) पृथिवी आदिकों के समीप से (महत्) बड़ा (एकम्) द्वितीय रहित (असुरत्वम्) दोषों को फेंकनेवाला है उससे व्यवस्थापित (यत्) जो (श्यावी) अन्धकाररूप (यम्या) जो सम्पूर्ण प्राणियों को निद्रा से युक्त करती है वह रात्रि (च) और (अरुषी) प्रकाशरूप प्रातःकाल (स्वसारौ) भगिनी के सदृश वर्त्तमान हुए (नाना) अनेक प्रकार के (वपूंषि) रूपों को (चक्राते) करते हैं (तयोः) उनका (अन्यत्) अन्य प्रातःकाल रूप (रोचते) प्रकाशित होता है (च) और (कृष्णम्) काला बेकाम (अन्यत्) दूसरा वर्ण रात्रिरूप जो आवरण करता है, वह जिससे प्रसिद्ध, उसको ब्रह्म जानो ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो परमेश्वर पृथिवी और सूर्य्य के घूमने की अवस्था को न करे तो रात्रि और दिन कैसे होवें और जिस जगदीश्वर ने पुरुषार्थ के लिये दिन और शयन करने के लिये रात्रि रची, उस ईश्वर का हृदय में सब ध्यान करो ॥११॥

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