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Rigveda Mandal 3 / Sukta 55 / Mantra 10

62 Sukta
22 Mantra
3/55/10
Devata- विश्वेदेवा, अग्निः Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
विष्णु॑र्गो॒पाः प॑र॒मं पा॑ति॒ पाथः॑ प्रि॒या धामा॑न्य॒मृता॒ दधा॑नः। अ॒ग्निष्टा विश्वा॒ भुव॑नानि वेद म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

विष्णुः॑ । गो॒पाः । प॒र॒मम् । पा॒ति॒ । पाथः॑ । प्रि॒या । धामा॑नि । अ॒मृता॑ । दधा॑नः । अ॒ग्निः । ता । विश्वा॑ । भुव॑नानि । वे॒द॒ । म॒हत् । दे॒वाना॑म् । अ॒सु॒र॒ऽत्वम् । एक॑म् ॥

Mantra without Swara
विष्णुर्गोपाः परमं पाति पाथः प्रिया धामान्यमृता दधानः। अग्निष्टा विश्वा भुवनानि वेद महद्देवानामसुरत्वमेकम्॥

विष्णुः। गोपाः। परमम्। पाति। पाथः। प्रिया। धामानि। अमृता। दधानः। अग्निः। ता। विश्वा। भुवनानि। वेद। महत्। देवानाम्। असुरऽत्वम्। एकम्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 29 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (अग्निः) अग्निरूप बिजुली के सदृश स्वयं प्रकाशित (विष्णुः) चर और अचर संसार में व्यापक परमात्मा (गोपाः) सबकी रक्षा करनेवाला परमेश्वर जिन (परमम्) उत्तम (पाथः) पृथिवी आदि अन्न और (प्रिया) कामना करने और सेवा करने योग्य (अमृता) नाश से रहित प्रकृति आदि और (धामानि) जन्म, स्थान और नाम को (दधानः) धारण और पुष्ट करता हुआ (पाति) रक्षा करता है (ता) उन (विश्वा) सम्पूर्ण (भुवनानि) निवासस्थानों को (वेद) जानता है, उस (देवानाम्) पृथिवी आदिकों के मध्य में (महत्) व्यापक हुए (एकम्) द्वितीयरहित ब्रह्म (असुरत्वम्) सबके फेंकनेवाले को आप लोग जानो ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो इस संसार का उत्पन्न, धारण, पालन और नाश करनेवाला है और सब जीवों के हित के लिये अनेक प्रकार के पदार्थों का निर्माण करता है, उसही की आप लोग सेवा करो ॥१०॥