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Rigveda Mandal 3 / Sukta 54 / Mantra 9

62 Sukta
22 Mantra
3/54/9
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सना॑ पुरा॒णमध्ये॑म्या॒रान्म॒हः पि॒तुर्ज॑नि॒तुर्जा॒मि तन्नः॑। दे॒वासो॒ यत्र॑ पनि॒तार॒ एवै॑रु॒रौ प॒थि व्यु॑ते त॒स्थुर॒न्तः॥

सना॑ । पु॒रा॒णम् । अधि॑ । ए॒मि॒ । आ॒रात् । म॒हः । पि॒तुः । ज॒नि॒तुः । जा॒मि । तत् । नः॒ । दे॒वासः॑ । यत्र॑ । प॒नि॒तारः॑ । एवैः॑ । उ॒रौ । प॒थि । विऽउ॑ते । त॒स्थुः । अ॒न्तरिति॑ ॥

Mantra without Swara
सना पुराणमध्येम्यारान्महः पितुर्जनितुर्जामि तन्नः। देवासो यत्र पनितार एवैरुरौ पथि व्युते तस्थुरन्तः॥

सना। पुराणम्। अधि। एमि। आरात्। महः। पितुः। जनितुः। जामि। तत्। नः। देवासः। यत्र। पनितारः। एवैः। उरौ। पथि। विऽउते। तस्थुः। अन्तरिति॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 25 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्र) जिसमें (पनितारः) व्यवहार करने अर्थात् स्तुति करनेवाले (देवासः) विद्वान् लोग (एवैः) प्राप्त करनेवालों से (उरौ) बड़े (व्युते) आवरण अर्थात् दूसरे करके ढाँपने से रहित इस प्रकार प्रसिद्ध (पथि) मार्ग में (अन्तः) मध्य में (तस्थुः) वर्त्तमान हैं (तत्) वह (पितुः) पालन करने और (जनितुः) उत्पन्न करनेवाले (महः) श्रेष्ठ पूजा करने योग्य से (जामि) उत्पन्न हुआ (आरात्) दूर वा समीप से जाना जाय और वह (नः) हम लोगों के दूर वा समीप से (सना) प्राचीन काल से सिद्ध और (पुराणम्) प्रथम नवीन को (अधि, एमि) स्मरण करता हूँ, उसके मध्य में आप लोग भी हैं ॥९॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिसमें सम्पूर्ण संसार स्थित है और जिसकी कही हुई मर्य्यादा से चलते हैं, वह सबका पालक उत्पन्न करनेवाला सब पदार्थों से बड़ा अनादि से सिद्ध ब्रह्म उपासना करने योग्य है, जो उसको जाने तो समीप में वर्त्तमान और न जाने तो अत्यन्त दूर वर्त्तमान होता है ॥९॥
Subject
अब ईश्वर के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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