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Rigveda Mandal 3 / Sukta 54 / Mantra 7

62 Sukta
22 Mantra
3/54/7
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒मा॒न्या वियु॑ते दू॒रेअ॑न्ते ध्रु॒वे प॒दे त॑स्थतुर्जाग॒रूके॑। उ॒त स्वसा॑रा युव॒ती भव॑न्ती॒ आदु॑ ब्रुवाते मिथु॒नानि॒ नाम॑॥

स॒मा॒न्या । वियु॑ते॒ इति॒ विऽयु॑ते । दू॒रेअ॑न्ते॒ इति॑ दू॒रेऽअ॑न्ते । ध्रु॒वे । प॒दे । त॒स्थ॒तुः॒ जा॒ग॒रूके॑ । उ॒त । स्वसा॑रा । यु॒व॒ती इति॑ । भव॑न्ती॒ इति॑ । आत् । ऊँ॒ इति॑ । ब्रु॒वा॒ते॒ इति॑ । मि॒थु॒नानि॑ । नाम॑ ॥

Mantra without Swara
समान्या वियुते दूरेअन्ते ध्रुवे पदे तस्थतुर्जागरूके। उत स्वसारा युवती भवन्ती आदु ब्रुवाते मिथुनानि नाम॥

समान्या। वियुते इति विऽयुते। दूरेअन्ते इति दूरेऽअन्ते। ध्रुवे। पदे। तस्थतुः जागरूके। उत। स्वसारा। युवती इति। भवन्ती इति। आत्। ऊँ इति। ब्रुवाते इति। मिथुनानि। नाम॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 25 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (युवती) यौवन अवस्था को प्राप्त हुई (स्वसारा) भगिनी (भवन्ती) वर्त्तमान (मिथुनानि) जोड़ों को (नाम) संज्ञा को (ब्रुवाते) कहती हैं (समान्या) तुल्य स्वभाववाली (वियुते) मिली और नहीं मिली हुई (दूरेअन्ते) दूर और समीप में (ध्रुवे) दृढ़ (पदे) प्राप्त होने योग्य (उत) भी (जागरूक) प्रसिद्ध अन्तरिक्ष और पृथिवी (तस्थतुः) स्थित हैं उनको (उ) और जानने के (आत्) अनन्तर ऐश्वर्य को प्राप्त होना चाहिये ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रेम से युक्त भगिनीजन मनोवाञ्छित वचनों को कहती हैं और जोड़े वर्त्तमान हैं, वैसे ही दूर और समीप में वर्त्तमान प्रकाश और अप्रकाश से युक्त लोक इस संसार में वर्त्तमान हैं ॥७॥
Subject
अब शिष्य के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।