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Rigveda Mandal 3 / Sukta 54 / Mantra 6

62 Sukta
22 Mantra
3/54/6
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
क॒विर्नृ॒चक्षा॑ अ॒भि षी॑मचष्ट ऋ॒तस्य॒ योना॒ विघृ॑ते॒ मद॑न्ती। नाना॑ चक्राते॒ सद॑नं॒ यथा॒ वेः स॑मा॒नेन॒ क्रतु॑ना संविदा॒ने॥

क॒विः । नृ॒ऽचक्षा॑ । अ॒भि । सी॒म् । अ॒च॒ष्ट॒ । ऋ॒तस्य॑ । योना॑ । विघृ॑ते॒ इति॒ विऽघृ॑ते । मद॑न्ती॒ इति॑ । नाना॑ । च॒क्रा॒ते॒ इति॑ । सद॑नम् । यथा॑ । वेः । स॒मा॒नेन॑ । क्रतु॑ना । स॒व्ँम्वि॒दा॒ने इति॑ स॒म्ऽवि॒दा॒ने ॥

Mantra without Swara
कविर्नृचक्षा अभि षीमचष्ट ऋतस्य योना विघृते मदन्ती। नाना चक्राते सदनं यथा वेः समानेन क्रतुना संविदाने॥

कविः। नृऽचक्षा। अभि। सीम्। अचष्ट। ऋतस्य। योना। विघृते इति विऽघृते। मदन्ती इति। नाना। चक्राते इति। सदनम्। यथा। वेः। समानेन। क्रतुना। संविदाने इति सम्ऽविदाने॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 25 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे स्त्री और पुरुष ! (यथा) जैसे (कविः) संपूर्ण विषयों के जानने (नृचक्षाः) मनुष्यों के देखनेवाले परमेश्वर (ऋतस्य) सत्य कारण के (योना) गृह में (विघृते) विशेष करके प्रकाशित में (नाना) अनेक प्रकार के (सदनम्) स्थान को (चक्राते) करते हैं (मदन्ती) आनन्द करती हुईं (वेः) पक्षी के (समानेन) तुल्य (क्रतुना) कर्म से (संविदाने) की है प्रतिज्ञा जिन्होंने उन स्त्रियों के सदृश वर्त्तमान अन्तरिक्ष और पृथिवी को (सीम्) सब ओर (अभि, अचष्ट) प्रकाशित किया, उसकी सब लोग उपासना करें ॥६॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिस परमेश्वर ने अनेक प्रकार के प्रकाश और अप्रकाश से युक्त लोक रचे, वही सबको जानने और सबको देखनेवाला परमात्मा निरन्तर उपासना करने योग्य है ॥६
Subject
अब ईश्वर के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।