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Rigveda Mandal 3 / Sukta 54 / Mantra 4

62 Sukta
22 Mantra
3/54/4
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒तो हि वां॑ पू॒र्व्या आ॑विवि॒द्र ऋता॑वरी रोदसी सत्य॒वाचः॑। नर॑श्चिद्वां समि॒थे शूर॑सातौ ववन्दि॒रे पृ॑थिवि॒ वेवि॑दानाः॥

उ॒तो इति॑ । हि । वा॒म् । पू॒र्व्याः । आ॒ऽवि॒वि॒द्रे । ऋत॑वरी॒ इत्यृत॑ऽवरी । रो॒द॒सी॒ इति॑ । स॒त्य॒ऽवाचः॑ । नरः॑ । चि॒त् । वा॒म् । स॒म्ऽइ॒थे । शूर॑ऽसातौ । व॒व॒न्दि॒रे । पृ॒थि॒वि॒ । वेवि॑दानाः ॥

Mantra without Swara
उतो हि वां पूर्व्या आविविद्र ऋतावरी रोदसी सत्यवाचः। नरश्चिद्वां समिथे शूरसातौ ववन्दिरे पृथिवि वेविदानाः॥

उतो इति। हि। वाम्। पूर्व्याः। आऽविविद्रे। ऋतवरी इत्यृतऽवरी। रोदसी इति। सत्यऽवाचः। नरः। चित्। वाम्। सम्ऽइथे। शूरऽसातौ। ववन्दिरे। पृथिवि। वेविदानाः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 24 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पृथिवि) भूमि के सदृश क्षमायुक्त राज्ञि ! जो (सत्यवाचः) यथार्थ वाणीवाले (वेविदानाः) अत्यन्त जानते हुए आपको (ववन्दिरे) प्रणाम करें और आप आपके स्वामी को (वाम्) आप दोनों (शूरसातौ) शूरवीर पुरुषों के विभाग और (समिथे) संग्राम में (नरः) अग्रणी पुरुषों के (चित्) सदृश प्रणाम करो और (उतो) भी (ऋतावरी) सत्य को प्राप्त करानेवाली स्त्री (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी के सदृश (पूर्व्याः) प्राचीन जनों में चतुर पुरुष आप दोनों को (हि) और (आ, विविद्रे) सब प्रकार प्राप्त होते हैं वह स्त्री और आप उनका और उसका सत्कार करो ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही लोग राज्य करने के योग्य हैं कि जो सत्य मानने, सत्य आचरण करने, सत्यवाणी बोलने और इन्द्रियों के जीतनेवाले विद्वान् जन होवें और वे ही रानी योग्य स्त्रियाँ हैं कि जो उक्त प्रकार के पति के सदृश होवें ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।