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Rigveda Mandal 3 / Sukta 54 / Mantra 2

62 Sukta
22 Mantra
3/54/2
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
महि॑ म॒हे दि॒वे अ॑र्चा पृथि॒व्यै कामो॑ म इ॒च्छञ्च॑रति प्रजा॒नन्। ययो॑र्ह॒ स्तोमे॑ वि॒दथे॑षु दे॒वाः स॑प॒र्यवो॑ मा॒दय॑न्ते॒ सचा॒योः॥

महि॑ । म॒हे । दि॒वे । अ॒र्च॒ । पृ॒थि॒व्यै । कामः॑ । मे॒ । इ॒च्छन् । च॒र॒ति॒ । प्र॒ऽजा॒नन् । ययोः॑ । ह॒ । स्तोमे॑ । वि॒दथे॑षु । दे॒वाः । स॒प॒र्यवः॑ । मा॒दय॑न्ते । सचा॑ । आ॒योः ॥

Mantra without Swara
महि महे दिवे अर्चा पृथिव्यै कामो म इच्छञ्चरति प्रजानन्। ययोर्ह स्तोमे विदथेषु देवाः सपर्यवो मादयन्ते सचायोः॥

महि। महे। दिवे। अर्च। पृथिव्यै। कामः। मे। इच्छन्। चरति। प्रऽजानन्। ययोः। ह। स्तोमे। विदथेषु। देवाः। सपर्यवः। मादयन्ते। सचा। आयोः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 24 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो युद्धविद्या को (प्रजानन्) जानता और विजय करता और राज्य की (इच्छन्) इच्छा करता हुआ (महे) बड़े (दिवे) प्रकाशमान के और (पृथिव्यै) भूमि के राज्य की प्राप्ति के लिये (चरति) चलता है उसको जो (मे) मेरी (महि) बड़ी (कामः) अभिलाषा है उसको शोभित करने की इच्छा करता हुआ विजय को प्राप्त होता है, उसका (अर्च) सत्कार करो और (ययोः) जिन विद्या और राज्य के (स्तोमे) प्रशंसा करने योग्य विजय और (विदथेषु) संग्रामों में (सपर्य्यवः) सेवक (देवाः) विद्वान् लोग (ह) निश्चय (आयोः) जीव के (सचा) सम्बन्ध से (मादयन्ते) प्रसन्न करते हैं, वे दोनों आप उन लोगों को आनन्द दीजिये ॥२॥
Essence
जो विद्या और राज्य की वृद्धि की कामना करने और अधिक अवस्थावाले युद्धविद्या में निपुण जन, राजा और मन्त्रियों का लक्ष्मी और विजय से सत्कार करें, उन जनों को राजा और मन्त्री भी सदा ही सुखित करें ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।