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Rigveda Mandal 3 / Sukta 54 / Mantra 15

62 Sukta
22 Mantra
3/54/15
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्रो॒ विश्वै॑र्वी॒र्यैः॒३॒॑ पत्य॑मान उ॒भे आ प॑प्रौ॒ रोद॑सी महि॒त्वा। पु॒रं॒द॒रो वृ॑त्र॒हा धृ॒ष्णुषे॑णः सं॒गृभ्या॑ न॒ आ भ॑रा॒ भूरि॑ प॒श्वः॥

इन्द्रः॑ । विश्वैः॑ । वी॒र्यैः॑ । पत्य॑मानः । उ॒भे इति॑ । आ । प॒प्रौ॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । म॒हि॒ऽत्वा । पु॒र॒म्ऽद॒रः । वृ॒त्र॒ऽहा । धृ॒ष्णुऽसे॑णः । स॒म्ऽगृभ्य॑ । नः॒ । आ । भ॒र॒ । भूरि॑ । प॒श्वः ॥

Mantra without Swara
इन्द्रो विश्वैर्वीर्यैः३ पत्यमान उभे आ पप्रौ रोदसी महित्वा। पुरंदरो वृत्रहा धृष्णुषेणः संगृभ्या न आ भरा भूरि पश्वः॥

इन्द्रः। विश्वैः। वीर्यैः। पत्यमानः। उभे इति। आ। पप्रौ। रोदसी इति। महिऽत्वा। पुरम्ऽदरः। वृत्रऽहा। धृष्णुऽसेणः। सम्ऽगृभ्य। नः। आ। भर। भूरि। पश्वः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 26 Mantra » 5

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Meaning
हे राजन् ! जो (वृत्रहा) मेघ को नाश करनेवाले सूर्य के सदृश (पुरन्दरः) शत्रुओं के नगरों का नाश करनेवाला (पत्यमानः) स्वामी के सदृश आचरण करता हुआ (धृष्णुसेनः) दृढ़ सेना और (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्ययुक्त राजा आप (विश्वैः) सम्पूर्ण (वीर्यैः) पराक्रमों से (महित्वा) महिमा से (उभे) दोनों (रोदसी) न्याय और भूमि के राज्य को (आ, पप्रौ) व्याप्त करते हैं वह आप (भूरि) बहुत (नः) हम लोगों और (पश्वः) पशुओं को (संगृभ्य) उत्तम प्रकार ग्रहण करके (आ, भरे) सब प्रकार पोषण कीजिये ॥१५॥
Essence
जैसे भूमि और सूर्य सब पदार्थों को धारण और उत्तम प्रकार पोषण करके बढ़ाते हैं, वैसे ही राजा आदि अध्यक्ष सब उत्तम गुणों को धारण प्रजा का पोषण, सेना की वृद्धि और शत्रुओं का नाश करके प्रजा की वृद्धि करें ॥१५॥
Subject
अब राजा के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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