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Rigveda Mandal 3 / Sukta 54 / Mantra 12

62 Sukta
22 Mantra
3/54/12
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सु॒कृत्सु॑पा॒णिः स्ववाँ॑ ऋ॒तावा॑ दे॒वस्त्वष्टाव॑से॒ तानि॑ नो धात्। पू॒ष॒ण्वन्त॑ ऋभवो मादयध्वमू॒र्ध्वग्रा॑वाणो अध्व॒रम॑तष्ट॥

सु॒ऽकृत् । सु॒ऽपा॒णिः । स्वऽवा॑न् । ऋ॒तऽवा॑ । दे॒वः । त्वष्टा॑ । अव॑से । तानि॑ । नः॒ । धा॒त् । पू॒ष॒ण्ऽवन्तः॑ । ऋ॒भ॒वः॒ । मा॒द॒य॒ध्व॒म् । ऊ॒र्ध्वऽग्रा॑वाणः । अ॒ध्व॒रम् । अ॒त॒ष्ट॒ ॥

Mantra without Swara
सुकृत्सुपाणिः स्ववाँ ऋतावा देवस्त्वष्टावसे तानि नो धात्। पूषण्वन्त ऋभवो मादयध्वमूर्ध्वग्रावाणो अध्वरमतष्ट॥

सुऽकृत्। सुऽपाणिः। स्वऽवान्। ऋतऽवा। देवः। त्वष्टा। अवसे। तानि। नः। धात्। पूषण्ऽवन्तः। ऋभवः। मादयध्वम्। ऊर्ध्वऽग्रावाणः। अध्वरम्। अतष्ट॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 26 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पूषण्वन्तः) बहुत पुष्टिकर्त्ता विद्यमान हैं जिनके वे (ऋभवः) बुद्धिमान् आप लोग जैसे (सुकृत्) सुन्दर धर्म युक्त कर्मकर्त्ता (सुपाणिः) सुन्दर हस्तयुक्त (स्ववान्) बहुत आत्मजन है जिसके वह (ऋतावा) सत्य का प्रकाश करनेवाला (त्वष्टा) प्रकाशकर्त्ता (देवः) विद्वान् (नः) हम लोगों को (अवसे) रक्षण आदि के लिये (तानि) उन अपेक्षित पदार्थों को (धात्) धारण करे और (ग्रावाणः) मेघों के सदृश (अध्वरम्) पालन करनेवाले व्यवहार को (अतष्ट) सूक्ष्म करता है, वैसे ही हम लोगों के लिये (मादयध्वम्) आनन्द दीजिये ॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे धार्मिक विद्वान् लोग मेघों के सदृश सबको आनन्द देते हैं, वैसे ही सब लोग विद्वानों को आनन्द देवें ॥१२॥
Subject
अब शिष्य के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।