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Rigveda Mandal 3 / Sukta 54 / Mantra 1

62 Sukta
22 Mantra
3/54/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ॒मं म॒हे वि॑द॒थ्या॑य शू॒षं शश्व॒त्कृत्व॒ ईड्या॑य॒ प्र ज॑भ्रुः। शृ॒णोतु॑ नो॒ दम्ये॑भि॒रनी॑कैः शृ॒णोत्व॒ग्निर्दि॒व्यैरज॑स्रः॥

इ॒मम् । म॒हे । वि॒द॒थ्या॑य । शू॒षम् । शश्व॑त् । कृत्वः॑ । ईड्या॑य । प्र । ज॒भ्रुः॒ । शृ॒णोतु॑ । नः॒ । दम्ये॑भिः । अनी॑कैः । शृ॒णोतु॑ । अ॒ग्निः । दि॒व्यैः । अज॑स्रः ॥

Mantra without Swara
इमं महे विदथ्याय शूषं शश्वत्कृत्व ईड्याय प्र जभ्रुः। शृणोतु नो दम्येभिरनीकैः शृणोत्वग्निर्दिव्यैरजस्रः॥

इमम्। महे। विदथ्याय। शूषम्। शश्वत्। कृत्वः। ईड्याय। प्र। जभ्रुः। शृणोतु। नः। दम्येभिः। अनीकैः। शृणोतु। अग्निः। दिव्यैः। अजस्रः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 24 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (कृत्वः) बहुत कार्य करनेवाले ! जिसके वह आप (महे) बड़े (ईड्याय) स्तुति करने के योग्य (विदथ्याय) संग्राम में उत्पन्न हुए के लिये (इमम्) इस (शश्वत्) निरन्तर (शूषम्) बलको (प्र, जभ्रुः) अच्छे प्रकार धारण करते हैं उन (नः) हम लोगों को आप (दम्येभिः) देने के योग्य (अनीकैः) सेना में वर्त्तमान जनों के साथ (शृणोतु) सुनिये (अजस्रः) निरन्तर वर्त्तमान (अग्निः) विद्वान् आप (दिव्यैः) श्रेष्ठ कर्मों के साथ हम लोगों का (शृणोतु) श्रवण करो ॥१॥
Essence
जो लोग युद्ध के लिये पूर्ण विद्या और बड़े बल को धारण करें, उनको राजजन सुन के निरन्तर सत्कार करें और उनके कृत्य की निरन्तर उन्नति करें, जिससे कि प्रसन्न हुए वे विजय से राजा को सदा शोभित करें ॥१॥
Subject
अब बाईस ऋचावाले चौवनवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में राजा के विषय को कहते हैं।