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Rigveda Mandal 3 / Sukta 53 / Mantra 9

62 Sukta
24 Mantra
3/53/9
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म॒हाँ ऋषि॑र्देव॒जा दे॒वजू॒तोऽस्त॑भ्ना॒त्सिन्धु॑मर्ण॒वं नृ॒चक्षाः॑। वि॒श्वामि॑त्रो॒ यदव॑हत्सु॒दास॒मप्रि॑यायत कुशि॒केभि॒रिन्द्रः॑॥

म॒हान् । ऋषिः॑ । दे॒व॒ऽजाः । दे॒वऽजू॑तः । अस्त॑भ्नात् । सिन्धु॑म् । अ॒र्ण॒वम् । नृ॒ऽचक्षाः॑ । वि॒श्वामि॑त्रः । यत् । अव॑हत् । सु॒ऽदास॑म् । अप्रि॑यायत । कु॒शि॒केभिः॑ । इन्द्रः॑ ॥

Mantra without Swara
महाँ ऋषिर्देवजा देवजूतोऽस्तभ्नात्सिन्धुमर्णवं नृचक्षाः। विश्वामित्रो यदवहत्सुदासमप्रियायत कुशिकेभिरिन्द्रः॥

महान्। ऋषिः। देवऽजाः। देवऽजूतः। अस्तभ्नात्। सिन्धुम्। अर्णवम्। नृऽचक्षाः। विश्वामित्रः। यत्। अवहत्। सुऽदासम्। अप्रियायत। कुशिकेभिः। इन्द्रः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 20 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्) जो (महान्) बड़प्पन रूप परिमाण से सब पदार्थों से बड़ा (ऋषिः) मन्त्रों के अर्थों का जाननेवाला (देवजाः) विद्वानों में उत्पन्न (देवजूतः) विद्वानों से प्रेरित (नृचक्षाः) मनुष्यों का देखनेवाला (विश्वामित्रः) सबका मित्र (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य्य का करनेवाला (कुशिकेभिः) कार्य्यों के सिद्धान्तों को जाननेवालों से जैसे सूर्य, पृथिवी (सिन्धुम्) नदी और (अर्णवम्) समुद्र को (अस्तभ्नात्) धारण करती है वैसे राज्य को धारण करे तो लक्ष्मी को (अवहत्) प्राप्त होता है (सुदासम्) उत्तम दान को (अप्रियायत) प्रिय के सदृश करता है, उसका सब लोग सत्कार करें ॥९॥
Essence
जैसे सूर्य सब लोकों से बड़ा और सबका धारणकर्त्ता तथा प्रकाश करनेवाला है, वैसे ही सबके जाननेवाले यथार्थवक्ता पुरुष हैं, ऐसा जानना चाहिये ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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