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Rigveda Mandal 3 / Sukta 53 / Mantra 8

62 Sukta
24 Mantra
3/53/8
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
रू॒पंरू॑पं म॒घवा॑ बोभवीति मा॒याः कृ॑ण्वा॒नस्त॒न्वं१॒॑ परि॒ स्वाम्। त्रिर्यद्दि॒वः परि॑ मुहू॒र्तमागा॒त्स्वैर्मन्त्रै॒रनृ॑तुपा ऋ॒तावा॑॥

रू॒पम्ऽरू॑पम् । म॒घऽवा॑ । बो॒भ॒वी॒ति॒ । मा॒याः । कृ॒ण्वा॒नः । त॒न्व॑म् । परि॑ । स्वाम् । त्रिः । यत् । दि॒वः । परि॑ । मु॒हू॒र्तम् । आ । अगा॑त् । स्वैः । मन्त्रैः॑ । अनृ॑तुऽपाः । ऋ॒तऽवा॑ ॥

Mantra without Swara
रूपंरूपं मघवा बोभवीति मायाः कृण्वानस्तन्वं१ परि स्वाम्। त्रिर्यद्दिवः परि मुहूर्तमागात्स्वैर्मन्त्रैरनृतुपा ऋतावा॥

रूपम्ऽरूपम्। मघऽवा। बोभवीति। मायाः। कृण्वानः। तन्वम्। परि। स्वाम्। त्रिः। यत्। दिवः। परि। मुहूर्तम्। आ। अगात्। स्वैः। मन्त्रैः। अनृतुऽपाः। ऋतऽवा॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 20 Mantra » 3

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Meaning
(यत्) जो (ऋतावा) सत्य से युक्त (मघवा) बहुत धन से युक्त (सूर्य्यः) सूर्य्य (दिवः) प्रकाशों को (मुहूर्त्तम्) दो घड़ी (स्वैः) अपने (मन्त्रैः) विचारों से (अनृतुपाः) नहीं ऋतुओं का पालन करनेवाला होकर (स्वाम्) अपने (तन्वम्) शरीर को (त्रिः) तीन बार (परि, आ) सब प्रकार (अगात्) प्राप्त होवें और (रूपंरूपम्) रूप-रूप के प्रति (मायाः) बुद्धियों को (कृण्वानः) करते हुए (परि, बोभवीति) अत्यन्त होता है उसको अध्यापक और उपदेश देनेवाला करें ॥८॥
Essence
जो परमेश्वर को लेके पृथिवीपर्यन्त पदार्थों के स्वरूप जानने और शीघ्र अन्य जनों के लिये विज्ञान देने और सूर्य्य के सदृश उत्तम शिक्षा सभ्यता और विनय के प्रकाश करनेवाले होवें, वे विद्याधर्म और राजधर्म के मन्त्र बढ़ाने में नियत करने के योग्य हैं ॥८॥
Subject
अब विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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