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Rigveda Mandal 3 / Sukta 53 / Mantra 7

62 Sukta
24 Mantra
3/53/7
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒मे भो॒जा अङ्गि॑रसो॒ विरू॑पा दि॒वस्पु॒त्रासो॒ असु॑रस्य वी॒राः। वि॒श्वामि॑त्राय॒ दद॑तो म॒घानि॑ सहस्रसा॒वे प्र ति॑रन्त॒ आयुः॑॥

इ॒मे । भो॒जाः । अङ्गि॑रसः । विऽरू॑पाः । दि॒वः । पु॒त्रासः॑ । असु॑रस्य । वी॒राः । वि॒श्वामि॑त्राय । दद॑तः । म॒घानि॑ । स॒ह॒स्र॒ऽसा॒वे । प्र । ति॒र॒न्ते॒ । आयुः॑ ॥

Mantra without Swara
इमे भोजा अङ्गिरसो विरूपा दिवस्पुत्रासो असुरस्य वीराः। विश्वामित्राय ददतो मघानि सहस्रसावे प्र तिरन्त आयुः॥

इमे। भोजाः। अङ्गिरसः। विऽरूपाः। दिवः। पुत्रासः। असुरस्य। वीराः। विश्वामित्राय। ददतः। मघानि। सहस्रऽसावे। प्र। तिरन्ते। आयुः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 20 Mantra » 2

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Meaning
हे राजन् ! जो (इमे) ये (अङ्गिरसः) प्राणों के सदृश बलयुक्त (भोजाः) भोजन करने तथा प्रजा के पालन करनेवाले (विरूपाः) अनेक प्रकार के रूप वा विकारयुक्त रूपवाले और (दिवः) प्रकाशस्वरूप (असुरस्य) शत्रुओं के फेंकनेवाले के (पुत्रासः) वायु के समान बलिष्ठ (वीराः) युद्धविद्या में परिपूर्ण (सहस्रसावे) संख्यारहित धन की उत्पत्ति जिसमें उस संग्राम में (विश्वामित्राय) संपूर्ण संसार मित्र है जिसका उसके लिये (मघानि) अतिश्रेष्ठ धनों को (ददतः) देते हुए जन (आयुः) जीवन का (प्र, तिरन्ते) उल्लङ्घन करते हैं वे ही लोग आपसे सत्कारपूर्वक रक्षा करने योग्य हैं ॥७॥
Essence
हे राजन् ! आप ऐसे वीरों के सहित प्रसन्न पुष्ट और युद्ध विद्या में कुशल सेना की वृद्धि करके सर्वदा विजय को प्राप्त होइये ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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