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Rigveda Mandal 3 / Sukta 53 / Mantra 6

62 Sukta
24 Mantra
3/53/6
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अपाः॒ सोम॒मस्त॑मिन्द्र॒ प्र या॑हि कल्या॒णीर्जा॒या सु॒रणं॑ गृ॒हे ते॑। यत्रा॒ रथ॑स्य बृह॒तो नि॒धानं॑ वि॒मोच॑नं वा॒जिनो॒ दक्षि॑णावत्॥

अपाः॑ । सोम॑म् । अस्त॑म् । इ॒न्द्र॒ । प्र । या॒हि॒ । क॒ल्या॒णीः । जा॒या । सु॒ऽरण॑म् । गृ॒हे । ते॒ । यत्र॑ । रथ॑स्य । बृ॒ह॒तः । नि॒ऽधान॑म् । वि॒ऽमोच॑नम् । वा॒जिनः॑ । दक्षि॑णाऽवत् ॥

Mantra without Swara
अपाः सोममस्तमिन्द्र प्र याहि कल्याणीर्जाया सुरणं गृहे ते। यत्रा रथस्य बृहतो निधानं विमोचनं वाजिनो दक्षिणावत्॥

अपाः। सोमम्। अस्तम्। इन्द्र। प्र। याहि। कल्याणीः। जाया। सुऽरणम्। गृहे। ते। यत्र। रथस्य। बृहतः। निऽधानम्। विऽमोचनम्। वाजिनः। दक्षिणाऽवत्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 20 Mantra » 1

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Meaning
हे (इन्द्र) ऐश्वर्य से युक्त स्वामिन् ! (यत्र) जिसमें (बृहतः) बड़े (रथस्य) विमान आदि वाहन के (वाजिनः) अग्नि आदि पदार्थ के (निधानम्) स्थापन और (विमोचनम्) अलग करने को (दक्षिणावत्) दक्षिणाओं के तुल्य करें और वहाँ स्थित होकर जो आपके (गृहे) गृह में (जाया) स्त्री वर्त्तमान है उसके साथ उस वाहन के ऊपर विराज कर (अस्तम्) गृह को (प्र, याहि) आइये (सोमम्) सम्पूर्ण रोगों के नाश करनेवाले महौषधि के रस का (अपाः) पान करिये और पीकर (सुरणम्) श्रेष्ठ संग्राम जिससे उसको प्राप्त होइये ॥६॥
Essence
राजा आदि विमान आदि वाहनों का निर्माण कर और उसमें कलायन्त्रों को रच के तथा अग्नि आदि पदार्थों को स्थित तथा अलग करके अपनी स्त्रियों के सहित गृह में आवें और देशान्तर को जावें, जो स्त्री शूरवीरा हो तो उसके साथ संग्राम के विजय के लिये जावें ॥६॥
Subject
अब राजा के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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