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Rigveda Mandal 3 / Sukta 53 / Mantra 5

62 Sukta
24 Mantra
3/53/5
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
परा॑ याहि मघव॒न्ना च॑ या॒हीन्द्र॑ भ्रातरुभ॒यत्रा॑ ते॒ अर्थ॑म्। यत्रा॒ रथ॑स्य बृह॒तो नि॒धानं॑ वि॒मोच॑नं वा॒जिनो॒ रास॑भस्य॥

परा॑ । या॒हि॒ । म॒घ॒ऽव॒न् । आ । च॒ । या॒हि॒ । इन्द्र॑ । भ्रा॒तः॒ । उ॒भ॒यत्र॑ । ते॒ । अर्थ॑म् । यत्र॑ । रथ॑स्य । बृ॒ह॒तः । नि॒ऽधान॑म् । वि॒ऽमोच॑नम् । वा॒जिनः॑ । रास॑भस्य ॥

Mantra without Swara
परा याहि मघवन्ना च याहीन्द्र भ्रातरुभयत्रा ते अर्थम्। यत्रा रथस्य बृहतो निधानं विमोचनं वाजिनो रासभस्य॥

परा। याहि। मघऽवन्। आ। च। याहि। इन्द्र। भ्रातः। उभयत्र। ते। अर्थम्। यत्र। रथस्य। बृहतः। निऽधानम्। विऽमोचनम्। वाजिनः। रासभस्य॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 19 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) धनयुक्त और (इन्द्र) सज्जनों के प्रति कोमल और दुष्टों के प्रति उग्र स्वभाववाले ! आप यहाँ से (परा) (याहि) दूर जाइये। हे (भ्रातः) बन्धु जन आप उससे प्राप्त होइये (यत्र) जहाँ (बृहतः) बड़े (रथस्य) सुन्दर वाहन के (रासभस्य) बिजुली आदि के सम्बन्धी के सदृश (वाजिनः) वेगयुक्त के (निधानम्) स्थापन (च) और (विमोचनम्) पृथक् करना होवे (यत्र) जहाँ (उभयत्र) गमन और आगमन में (ते) आपके (अर्थम्) प्रयोजन को हम लोग प्राप्त होवें ॥५॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि सर्वत्र भ्रमण कार्य्यसिद्धि के लिये करें और नहीं सदा भ्रमण ही करना किन्तु गृह में स्थित हो सम्पूर्ण बन्धुओं के साथ मेल करके फिर भी ऐश्वर्य्य की प्राप्ति के लिये एक देश से दूसरे देश में जावें और आवें ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।