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Rigveda Mandal 3 / Sukta 53 / Mantra 24

62 Sukta
24 Mantra
3/53/24
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒मे इ॑न्द्र भर॒तस्य॑ पु॒त्रा अ॑पपि॒त्वं चि॑कितु॒र्न प्र॑पि॒त्वम्। हि॒न्वन्त्यश्व॒मर॑णं॒ न नित्यं॒ ज्या॑वाजं॒ परि॑ णयन्त्या॒जौ॥

इ॒मे । इ॒न्द्र॒ । भ॒र॒तस्य॑ । पु॒त्राः । अ॒प॒ऽपि॒त्वम् । चि॒कि॒तुः॒ । न । प्र॒ऽपि॒त्वम् । हि॒न्वन्ति॑ । अश्व॑म् । अर॑णम् । न । नित्य॑म् । ज्या॒ऽवाज॑म् । परि॑ । न॒य॒न्ति॒ । आ॒जौ ॥

Mantra without Swara
इमे इन्द्र भरतस्य पुत्रा अपपित्वं चिकितुर्न प्रपित्वम्। हिन्वन्त्यश्वमरणं न नित्यं ज्यावाजं परि णयन्त्याजौ॥

इमे। इन्द्र। भरतस्य। पुत्राः। अपऽपित्वम्। चिकितुः। न। प्रऽपित्वम्। हिन्वन्ति। अश्वम्। अरणम्। न। नित्यम्। ज्याऽवाजम्। परि। नयन्ति। आजौ॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 23 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त करनेवाले ! आपकी सेना के (भरतस्य) रक्षा करने और (चिकितुः) जाननेवाले के (न) तुल्य (इमे) ये मेरे (पुत्राः) उत्तम प्रकार शिक्षा को प्राप्त सन्तानों के सदृश सेवक लोग (अपपित्वम्) नाश और (प्रपित्वम्) उत्तम प्रकार प्राप्त कराने को (अश्वम्) घोड़े को (अरणम्) प्रेरणा किये हुए के (न) तुल्य (हिन्वन्ति) बढ़ाते हैं और (आजौ) संग्राम में (ज्यावाजम्) धनुष् की ताँत के शब्द को (नित्यम्) नित्य (परि) सब प्रकार (नयन्ति) प्राप्त करते हैं, उसकी और उनकी आप अपने आत्मा के सदृश रक्षा करो ॥२४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा आदि अपने नाश और वृद्धि को जानते हैं, सेना में वर्त्तमान साध्यक्ष सेवकों को युद्ध कर्म में चतुर और अनुरक्तों का पुत्र के सदृश पालन करते हैं, उनकी सदा ही वृद्धि होती है, पराजय कहाँ से होवे ॥२४॥। इस सूक्त में बिजुली, मेघ, विद्वान्, राजा, प्रजा और सेना के कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह तिरपनवाँ सूक्त और तेईसवाँ वर्ग तीसरे मण्डल में चौथा अनुवाक समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।