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Rigveda Mandal 3 / Sukta 53 / Mantra 22

62 Sukta
24 Mantra
3/53/22
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प॒र॒शुं चि॒द्वि त॑पति शिम्ब॒लं चि॒द्वि वृ॑श्चति। उ॒खा चि॑दिन्द्र॒ येष॑न्ती॒ प्रय॑स्ता॒ फेन॑मस्यति॥

प॒र॒शुम् । चि॒त् । वि । त॒प॒ति॒ । शि॒म्ब॒लम् । चि॒त् । वि । वृ॒श्च॒ति॒ । उ॒खा । चि॒त् । इ॒न्द्र॒ येष॑न्ती । प्रऽय॑स्ता । फेन॑म् । अ॒स्य॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
परशुं चिद्वि तपति शिम्बलं चिद्वि वृश्चति। उखा चिदिन्द्र येषन्ती प्रयस्ता फेनमस्यति॥

परशुम्। चित्। वि। तपति। शिम्बलम्। चित्। वि। वृश्चति। उखा। चित्। इन्द्र येषन्ती। प्रऽयस्ता। फेनम्। अस्यति॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 23 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त ! जो आपकी सेना लोहार (परशुम्) परशारूप शस्त्र को (चित्) जैसे वैसे शत्रुओं को (वि, तपति) विशेष करके सन्ताप देती है (शिम्बलम्) शेमर वृक्ष के पुष्प वा पत्र को (चित्) जैसे (वि, वृश्चति) विशेष करके काटता है (प्रयस्ता) प्रेरित हुई (येषन्ती) वहता तथा प्राप्त हुआ (उखा) पाक करनेका पात्र (चित्) जैसे (फेनम्) फेने को वैसे शत्रुओं को (अस्यति) फेंकती है उसका आपसे सदा सत्कार करने योग्य है ॥२२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा लोग श्रेष्ठ वीरों की सेना की रक्षा करते हैं, वे ही विजय को प्राप्त होकर शोभित होते हैं ॥२२॥
Subject
अब राजा के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।