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Rigveda Mandal 3 / Sukta 53 / Mantra 20

62 Sukta
24 Mantra
3/53/20
Devata- रथाङ्गानि Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒यम॒स्मान्वन॒स्पति॒र्मा च॒ हा मा च॑ रीरिषत्। स्व॒स्त्या गृ॒हेभ्य॒ आव॒सा आ वि॒मोच॑नात्॥

अ॒यम् । अ॒स्मान् । वन॒स्पतिः॑ । मा । च॒ । हाः । मा । च॒ । रि॒रि॒ष॒त् । स्व॒स्ति । आ । गृ॒हेभ्यः॑ । आ । अ॒व॒सै । आ । वि॒ऽमोच॑नात् ॥

Mantra without Swara
अयमस्मान्वनस्पतिर्मा च हा मा च रीरिषत्। स्वस्त्या गृहेभ्य आवसा आ विमोचनात्॥

अयम्। अस्मान्। वनस्पतिः। मा। च। हाः। मा। च। रिरिषत्। स्वस्ति। आ। गृहेभ्यः। आ। अवसै। आ। विऽमोचनात्॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 22 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! जैसे (अयम्) यह (वनस्पतिः) वन का पालन करनेवाला (अस्मान्) हम लोगों का त्याग नहीं करता है वैसे हम लोगों का (मा) मत (हाः) त्याग करिये (च) और जैसे सूर्य्य हम लोगों की हिंसा नहीं करता है वैसे ही आप (मा, च) नहीं (रीरिषत्) नाश कीजिये। और (आ, अवसै) अच्छे निश्चय के लिये (आ, गृहेभ्यः) सब प्रकार गृहों से (स्वस्ति) सुख हो (आ, विमोचनात्) त्याग तक सुख प्राप्त होवे ॥२०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अन्न आदि वस्तु सबके रक्षक होवें, वैसे राजा के पुरुष सबके पालनकर्त्ता हों और न्याय का त्याग करके अन्याय कभी न करें ॥२०॥
Subject
अब राजा के पुरुष के विषय को कहते हैं।