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Rigveda Mandal 3 / Sukta 53 / Mantra 2

62 Sukta
24 Mantra
3/53/2
Devata- इन्द्र: Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तिष्ठा॒ सु कं॑ मघव॒न्मा परा॑ गाः॒ सोम॑स्य॒ नु त्वा॒ सुषु॑तस्य यक्षि। पि॒तुर्न पु॒त्रः सिच॒मा र॑भे त॒ इन्द्र॒ स्वादि॑ष्ठया गि॒रा श॑चीवः॥

तिष्ठ॑ । सु । क॒म् । म॒घ॒ऽव॒न् । मा । परा॑ । गाः॒ । सोम॑स्य । नु । त्वा॒ । सुऽसु॑तस्य । य॒क्षि॒ । पि॒तुः । न । पु॒त्रः । सिच॑म् । आ । र॒भे॒ । ते॒ । इन्द्र॑ । स्वादि॑ष्ठया । गि॒रा । श॒ची॒ऽवः॒ ॥

Mantra without Swara
तिष्ठा सु कं मघवन्मा परा गाः सोमस्य नु त्वा सुषुतस्य यक्षि। पितुर्न पुत्रः सिचमा रभे त इन्द्र स्वादिष्ठया गिरा शचीवः॥

तिष्ठ। सु। कम्। मघऽवन्। मा। परा। गाः। सोमस्य। नु। त्वा। सुऽसुतस्य। यक्षि। पितुः। न। पुत्रः। सिचम्। आ। रभे। ते। इन्द्र। स्वादिष्ठया। गिरा। शचीऽवः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 19 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) बहुत धनयुक्त (इन्द्र) ऐश्वर्य के करनेवाले ! आप (सुषुतस्य) उत्तम प्रकार सिद्ध (सोमस्य) बड़ी ओषधियों के समूहरूप ऐश्वर्य्य के समीप के (कम्) सुख को (सु, तिष्ठ) करिये। और हे (शचीवः) उत्तम प्रजाओं से युक्त जैसे (ते) आपकी (स्वादिष्ठया) अत्यन्त मधुर आदि रस से युक्त (गिरा) वाणी से (सिञ्चनम्) सिंचन का (आ, रभे) प्रारम्भ करें (त्वा) आपको (नु) शीघ्र (पुत्रः) पुत्र (पितुः) पिता से (न) नहीं (आ, रभे) प्रारम्भ करते हैं, वह आप हम लोगों को (यक्षि) प्राप्त होइये और हम लोगों से (मा) नहीं (परा, गाः) दूर जाइये ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् ! जैसे पुत्र पिता की सेवा करता है, वैसे ही वृद्ध विद्वानों की सेवा करो और कभी धर्म से पृथक् न होओ, अन्य जनों को सुखी करके सुखी होओ ॥२॥
Subject
अब राजा के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।