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Rigveda Mandal 3 / Sukta 53 / Mantra 19

62 Sukta
24 Mantra
3/53/19
Devata- रथाङ्गानि Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒भि व्य॑यस्व खदि॒रस्य॒ सार॒मोजो॑ धेहि स्पन्द॒ने शिं॒शपा॑याम्। अक्ष॑ वीळो वीळित वी॒ळय॑स्व॒ मा यामा॑द॒स्मादव॑ जीहिपो नः॥

अ॒भि । व्य॒य॒स्व॒ । ख॒दि॒रस्य॑ । सार॑म् । ओजः॑ । धे॒हि॒ । स्प॒न्द॒ने । शिं॒शपा॑याम् । अक्ष॑ । वी॒ळो॒ इति॑ । वी॒ळि॒त॒ । वी॒ळय॑स्व । मा । यामा॑त् । अ॒स्मात् । अव॑ । जी॒हि॒पः॒ । नः॒ ॥

Mantra without Swara
अभि व्ययस्व खदिरस्य सारमोजो धेहि स्पन्दने शिंशपायाम्। अक्ष वीळो वीळित वीळयस्व मा यामादस्मादव जीहिपो नः॥

अभि। व्ययस्व। खदिरस्य। सारम्। ओजः। धेहि। स्पन्दने। शिंशपायाम्। अक्ष। वीळो इति। वीळित। वीळयस्व। मा। यामात्। अस्मात्। अव। जीहिपः। नः॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 22 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अक्ष) विद्याओं से व्याप्त ! आप हम लोगों में (खदिरस्य) इस काष्ठ के (सारम्) दृढ़ भाग के सदृश (ओजः) बल को (धेहि) धारण कीजिये (शिंशपायाम्) इस काष्ठ को वृक्षविशेष (स्पन्दने) कुछ चलने में (अभि) सबप्रकार (व्ययस्व) खर्च करो। और हे (वीळो) बलयुक्त और (वीळित) बहुतों में प्रशंसित पुरुष ! (नः) हम लोगों को (वीळयस्व) प्रेरणा करो (अस्मात्) इस (यामात्) प्रहर से (मा) नहीं (अव, जीहिपः) त्यागिये ॥१९॥
Essence
हे आचार्य्य ! हम लोगों में दृढ़ बल को धारण करो, श्रेष्ठ कर्मों में हम लोगों की प्रेरणा करो और कभी मत त्याग करो ॥१९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।