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Rigveda Mandal 3 / Sukta 53 / Mantra 18

62 Sukta
24 Mantra
3/53/18
Devata- रथाङ्गानि Rishi- गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा Chhanda- निचृद्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
बलं॑ धेहि त॒नूषु॑ नो॒ बल॑मिन्द्रान॒ळुत्सु॑ नः। बलं॑ तो॒काय॒ तन॑याय जी॒वसे॒ त्वं हि ब॑ल॒दा असि॑॥

बल॑म् । धे॒हि॒ । त॒नूषु॑ । नः॒ । बल॑म् । इ॒न्द्र॒ । अ॒न॒ळुत्ऽसु॑ । नः॒ । बल॑म् । तो॒काय॑ । तन॑याय । जी॒वसे । त्वम् । हि । ब॒ल॒ऽदाः । असि॑ ॥

Mantra without Swara
बलं धेहि तनूषु नो बलमिन्द्रानळुत्सु नः। बलं तोकाय तनयाय जीवसे त्वं हि बलदा असि॥

बलम्। धेहि। तनूषु। नः। बलम्। इन्द्र। अनळुत्ऽसु। नः। बलम्। तोकाय। तनयाय। जीवसे। त्वम्। हि। बलऽदाः। असि॥

Ashtak » 3 Adhyay » 3 Varga » 22 Mantra » 3

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Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के देनेवाले ! (हि) जिससे आप (बलदाः) बल के देनेवाले (असि) हैं इससे (नः) हम लोगों के (तनूषु) शरीरों में (बलम्) बल को (धेहि) धारण करो और (नः) हम लोगों को (अनळुत्सु) गौ आदिकों में (बलम्) बल को धारण करो, हम लोगों के (जीवसे) जीवन और (तोकाय) छोटे बालक तथा (तनयाय) कौमार अवस्था को प्राप्त पुरुष के लिये (बलम्) पराक्रम को धारण करो ॥१८॥
Essence
हे आचार्य्य ! आप जिससे कि शरीर और आत्मा के बल से युक्त हो, इससे हम लोगों में पूर्ण शरीर और आत्मा के बल को धारण करो ॥१८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।